तेजस्वी का भूमिहार प्रेम, हकीकत या फसाना- इतिहास के कई कटु अनुभवों से आशंकित है बड़ा वर्ग

तेजस्वी का भूमिहार प्रेम, हकीकत या फसाना- इतिहास के कई कटु अनुभवों से आशंकित है बड़ा वर्ग

हाल ही में 24 सीटों के लिए सम्पन्न हुए विधानपरिषद चुनाव और बोचहां विधानसभा के उपचुनाव परिणाम के बाद प्रदेश में नए जातीय समीकरण की चर्चा होने लगी है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल के हौसले बुलंद लग रहे हैं,वीआईपी प्रमुख उपचुनाव में हार कर भी खुशियाँ मना रहे हैं तो विधानसभा चुनाव परिणाम की तरह ही विधानपरिषद चुनाव में भी जदयू एक बार फिर तीसरे नंबर की पार्टी बन गई। कांग्रेस के नए प्रदेश अध्यक्ष के लिए मंथन चल रहा है और जातीय समीकरण देखे जा रहे हैं। हालाँकि कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के लिए भूमिहार जाति से आने वाले कन्हैया कुमार के नाम की चर्चा जोरों पर है। इस सबसे बढ़कर बिहार की राजनीति में जो सबसे आश्चर्यजनक घटना हुई है, वो है राष्ट्रीय जनता दल का भूमिहार-ब्राह्मण प्रेम। 

जिस भूमिहार-ब्राह्मण समाज को बुरा भला कहकर राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने बिहार की राजनीति में खुद को स्थापित किया था,आज उनके पुत्र तेजस्वी यादव भूमिहार-ब्राह्मण समाज से गठजोड़ कर 'भू माई' समीकरण की बात कर रहे हैं। लेकिन इसे कोई कैसे भूल सकता है कि राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने ही कभी "भूरा बाल साफ करो" का नारा दिया था। ये बात अलग है कि बाद में लालू यादव ने इसे कबूल नहीं किया। राजद के शासन काल में प्रदेश में जातीय दंगे होते रहे,नरसंहार हुए, अनगिनत मौतें हुई। प्रदेश के उन क्षेत्रों में जहाँ भूमिहार-ब्राह्मणों की आबादी कम थी,लोग वहाँ से पलायन करने को मजबूर थे। यादव-पिछड़ी जातियों बनाम भूमिहार-सवर्ण जातियों की लड़ाई को लालू यादव ने खूब हवा दी। लालू प्रसाद यादव ने समाज में आग लगाने का काम किया और हमेशा उस लड़ाई में आग में घी डालते रहे।

नीतीश कुमार के उदय के बाद राजनीति के हासिए पर जा रहे लालू यादव की राजद को 2015 के विधानसभा चुनाव में भूमिहार समाज से आने वाले मोकामा विधानसभा क्षेत्र के विधायक अनन्त सिंह के नाम की संजीवनी मिली और लालू प्रसाद यादव ने अपनी हर चुनावी सभा में भूमिहार जाति से आने वाले अनन्त सिंह की चर्चा की।चर्चा ही नहीं की,अनन्त सिंह और भूमिहार जाति का नाम ले लेकर यादवों और पिछड़ों को भूमिहारों के विरुद्ध एकजुट होने के लिए ललकारते रहे।हम सब ने देखा कि समाज में आग लगाकर एक बार फिर राजद की सत्ता में वापसी हुई और राजद प्रदेश का सबसे बड़ा दल बनने में सफल रहा।

भूमिहार-ब्राह्मणों के लिए लालू यादव बनाम नीतीश कुमार - ये कहना गलत नहीं होगा कि भूमिहार ब्राह्मण को बर्बाद करने की जिस नीति पर आज नीतीश कुमार चल रहे हैं, लालू प्रसाद यादव ने उसकी नींव रखी थी।भूमिहार ब्राह्मणों के लिए जहाँ लालू प्रसाद यादव सदा अपनी जुबान से जहर उगलते रहे,वहीं नीतीश कुमार अपने शासन में भूमिहार ब्राह्मण बहुल इलाकों की उपेक्षा करते रहे हैं।इतना ही नहीं,नीतीश कुमार ने तो भूमिहारों के आजीविका के साधनों को तहसनहस करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

तेजस्वी ने जताया कि राजनीति में भूमिहारों से परहेज नहीं - अब अचानक से राष्ट्रीय जनता दल का भूमिहार-ब्राह्मण के लिए जगा प्रेम, बिहार की राजनीति के लिए आश्चर्यजनक घटना ही है।विधान परिषद चुनाव में जहाँ राजद ने भूमिहारों को टिकट देने में दरियादिली दिखाई तो वहीं भूमिहारों ने पटना और लखीसराय जैसे क्षेत्र में राजद प्रत्याशी का समर्थन कर उनके जीत का मार्ग प्रशस्त किया।एक तरफ जहाँ लालू प्रसाद यादव ने हमेशा अनन्त सिंह का विरोध किया तो वहीं तेजस्वी यादव ने अनन्त सिंह के हनुमान कार्तिक कुमार को पटना जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र से विधानपरिषद चुनाव का टिकट देकर ये जता दिया कि उन्हें राजनीति में सफल होने के लिए भूमिहारों के साथ से कोई परहेज नहीं है।हाल ही में भूमिहार ब्राह्मण बहुल क्षेत्र मोकामा में हो रहे एक यज्ञ में तेजस्वी यादव का मुख्य अतिथि के तौर पर जाना और यज्ञ के आयोजकों के द्वारा सोने का मुकुट पहनाकर तेजस्वी यादव का स्वागत करना,दोनों के लिए एक-दूसरे को स्वीकार करने का संदेश देता है।

राजनीतिक दलों के लिए अछूत हो गए भूमिहार-ब्राह्मण -  पिछले करीब तीन दशक से बिहार में भूमिहार ब्राह्मण उपेक्षा के शिकार हो रहे हैं।राजनीतिक दलों के लिए वो अछूत बन गए हैं।ये कहना भी गलत नहीं होगा कि पिछले करीब तीन दशक से बिहार की राजनीति भूमिहारों और ब्राह्मणों के विरोध के दम पर चल रही है।राजद हो या जदयू,दोनों ने ही सत्ता हासिल करने के लिए समाज को बाँटने का काम किया। जबकि भारतीय जनता पार्टी के गठन के समय ऐसा माना जा रहा था कि भारतीय जनता पार्टी भूमिहार ब्राह्मण समाज को उचित सम्मान देगी और सवर्ण जातियों के हक की लड़ाई लड़ेगी। शुरुआत में ऐसा हुआ भी,लेकिन वक्त के साथ भाजपा में भी भूमिहार ब्राह्मण सहित सभी सवर्ण जातियों की उपेक्षा होने लगी। हालात दिन ब दिन बदतर ही होते चले जा रहे हैं। राजद की पिछलग्गू बनने के बाद से कांग्रेस से भी भूमिहार-ब्राह्मण समाज का मोह भंग हो गया।राजनीतिक दलों ने स्पष्ट रूप से ये जता दिया कि अल्पसंख्यक होने की वजह से उनके दिल में भूमिहार ब्राह्मण समाज के लिए कोई खास जगह नहीं है।

राजद की मजबूरी - राजद के वोट बैंक रहे दलित,यादव और मुस्लिम समाज पर जदयू ने जबरदस्त सेंधमारी की और दलित,महादलित और मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में जदयू से जुड़ चुके हैं। ऐसे में राजद के पास भूमिहार-ब्राह्मण सहित सवर्ण समाज को मनाने और जोड़ने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं रह गया है। ये बात भी तय है कि यदि राजद में भूमिहार-ब्राह्मण सहित अन्य सवर्ण जातियों को उचित सम्मान मिले और यादव,भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत और कायस्त समाज एकजुट हो जाए तो फिर राजद पुनः सत्ता पर काबिज हो सकता है।

भूमिहारों ने दिखाई दरियादिली, राजद के स्थायी वोट बैंक पर संदेह - भूमिहार ब्राह्मण समाज ने तो हाल में सम्पन्न हुए विधानपरिषद और विधानसभा के उपचुनाव में अपनी दरियादिली दिखा दी,लेकिन यादव समाज ने पटना विधानपरिषद क्षेत्र से भूमिहार जाति से आने वाले कार्तिक कुमार को वोट न देकर,निर्दलीय चुनाव लड़ रहे एक यादव उम्मीदवार को अपना मत दिया।उन्होंने ये जता दिया कि यादव समाज केवल यादव का ही समर्थन करता है। भूमिहार ब्राह्मणों के लिए सदा जहर उगलने वाले लालू प्रसाद यादव क्या बुढ़ापे में बदल जाएंगे और क्या सवर्ण नेताओं को सम्मान देने की आदत डाल पाएंगे लालू प्रसाद यादव के पुत्र ? राजद के इतिहास में पहली बार किसी सवर्ण जाति से आने वाले व्यक्ति को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, लगा कि राजद का हृदयपरिवर्तन हो रहा है लेकिन पार्टी में उनकी क्या अहमियत है, ये हम सब जानते हैं। राजद में भूमिहार ब्राह्मण समाज के लिए जगा प्रेम, हकीकत है या फसाना, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। लेकिन राजद का स्थायी वोट बैंक भूमिहार ब्राह्मण सहित सवर्ण समाज को स्वीकार करेगा, इसमें संदेह है।

(आलेख : अनुभव/ यह लेखक के निजी विचार हैं)


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