अधिकारियों की लोकेशन हो रही थी लीक! जानिए कैसे माफिया सरकारी वाहनों में जीपीएस लगाकर कर रहे थे रेकी
खनन व अवैध कारोबारियों द्वारा परिवहन विभाग के अधिकारियों की गाड़ियों में जीपीएस चिप लगाकर रेकी करने का मामला सामने आया है। DTO समेत तीन अधिकारियों के वाहनों से GPS ट्रैकर बरामद किए गए हैं। साइबर थाने में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी गई
बिहार के औरंगाबाद जिले से सामने आई यह खबर अवैध कारोबार में लिप्त धंधेबाजों द्वारा अपनाए गए एक चौंकाने वाले और नए हथकंडे का पर्दाफाश करती है। जिले में सरकारी तंत्र और विभाग की कार्रवाई से बचने के लिए धंधेबाजों ने सीधे परिवहन अधिकारियों के वाहनों की रेकी करना शुरू कर दिया था। इस काम को अंजाम देने के लिए उन्होंने अधिकारियों की गाड़ियों में जीपीएस ट्रैकिंग डिवाइस लगा दिए थे, जिससे उनकी लोकेशन लगातार लीक हो रही थी।
जानकारी के अनुसार, धंधेबाजों का मुख्य मकसद परिवहन विभाग की टीम की पल-पल की गतिविधियों पर पैनी नजर रखना था। अधिकारी किस इलाके में जांच के लिए निकल रहे हैं और किस क्षेत्र में छापेमारी होने वाली है, इसकी पूरी सटीक जानकारी अपराधियों को पहले ही मिल जाती थी। समय से पहले जानकारी मिल जाने के कारण अवैध कारोबार में शामिल लोग तुरंत सतर्क हो जाते थे और विभाग की किसी भी संभावित कार्रवाई से आसानी से बच निकलते थे।
परिवहन विभाग को जब इस बात की भनक लगी, तो वाहनों की गहन जांच की गई। जांच के दौरान जिला परिवहन पदाधिकारी (DTO) सह अपर जिला परिवहन पदाधिकारी (ADTO) संतोष कुमार सिंह और दो मोटरयान निरीक्षकों (MVI) सुजीता कुमारी व नंदन राज के वाहनों से जीपीएस ट्रैकिंग डिवाइस बरामद किए गए। तीन अधिकारियों की सरकारी गाड़ियों में गुप्त रूप से जीपीएस डिवाइस लगाए जाने की पुष्टि के बाद विभाग में हड़कंप मच गया।
इस गंभीर मामले का संज्ञान लेते हुए जिला परिवहन पदाधिकारी (DTO) सह ADTO संतोष कुमार सिंह ने साइबर थाने में प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के लिए लिखित आवेदन प्रस्तुत किया। अपने आवेदन में उन्होंने एक विशेष मोबाइल नंबर के धारक और वाहन संख्या (BR 01 PP 9966) के मालिक के खिलाफ सरकारी वाहन में अवैध रूप से जीपीएस डिवाइस लगाने के आरोप में सख्त कार्रवाई करने की मांग की है।
अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार के कृत्य से न केवल सरकारी कामकाज बुरी तरह बाधित हो रहा था, बल्कि विशेष रूप से राजस्व संग्रहण और ओवरलोडेड/अवैध वाहनों पर होने वाली शमन (जुर्माना) कार्रवाई पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा था। इसके अलावा, DTO ने यह भी आशंका जताई कि अधिकारियों की हर गतिविधि पर नजर रखने से मोटरयान निरीक्षकों एवं अन्य अधिकारियों के साथ किसी भी समय कोई अप्रिय या जानलेवा घटना घट सकती है। यह निजता के हनन के साथ-साथ गंभीर सुरक्षा खतरा भी है।
इस घटना के सामने आने के बाद परिवहन विभाग पूरी तरह से अलर्ट मोड पर आ गया है। विभाग की ओर से अपने अन्य सभी वाहनों की भी गहन तकनीकी जांच कराई जा रही है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कहीं किसी अन्य गाड़ी में भी इस तरह का गुप्त ट्रैकिंग डिवाइस तो नहीं छुपाया गया है। अधिकारियों का मानना है कि अवैध कारोबार जारी रखने के उद्देश्य से ही यह सुनियोजित रेकी की जा रही थी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए बरामद तीनों जीपीएस डिवाइसेज को साइबर थाने के सुपुर्द कर दिया गया है। साइबर थानाध्यक्ष अनुराग कुमार के अनुसार, परिवहन विभाग से आवेदन प्राप्त हो चुका है और पुलिस ने मामले की तकनीकी जांच शुरू कर दी है। पुलिस अब इस बात का पता लगा रही है कि ये जीपीएस डिवाइस कहां से खरीदे गए, गाड़ियों में इन्हें किसने लगाया और इनके जरिए डेटा व लोकेशन किस सर्वर या मोबाइल पर हासिल की जा रही थी।
साइबर थाना पुलिस और परिवहन विभाग दोनों ने ही अपराधियों को बेनकाब करने का संकल्प व्यक्त किया है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि जांच प्रक्रिया के बाद जो भी व्यक्ति या गिरोह इसमें दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ सुसंगत कानूनी धाराओं के तहत कड़ी कार्रवाई की जाएगी। इस घटना ने यह साबित कर दिया है कि अपराध को अंजाम देने वाले अब आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर शासन व प्रशासन को चुनौती देने का प्रयास कर रहे हैं।
धीरज पराशर की रिपोर्ट