Bihar Congress: राहुल की सियासी इम्तिहान की घड़ी, बिहार में बिखरी कांग्रेस को संजीवनी देंगे या अंदरूनी बगावत और गठबंधन की सियासत बनेगी सबसे बड़ी दीवार? पढ़िए

Bihar Congress: चुनावी शिकस्त के बाद पहली बार कांग्रेस सांसद राहुल गांधी 15 जुलाई को पटना में छात्र सम्मेलन को संबोधित करेंगे।

राहुल की सियासी इम्तिहान की घड़ी- फोटो : social Media

Bihar Congress:  बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के बाद कांग्रेस एक ऐसे सियासी मोड़ पर खड़ी है, जहां से वापसी की राह आसान नहीं दिख रही। चुनावी शिकस्त के बाद पहली बार कांग्रेस सांसद राहुल गांधी 15 जुलाई को पटना में छात्र सम्मेलन को संबोधित करेंगे। यह दौरा महज एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बिहार में कांग्रेस की खोई हुई सियासी ज़मीन वापस पाने की कवायद माना जा रहा है। राहुल के सामने चुनौती सिर्फ भाजपा और सत्ता पक्ष से मुकाबले की नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के भीतर की खींचतान, घटते जनाधार और महागठबंधन की उलझी हुई सियासत को भी साधने की है।

बिहार में कांग्रेस का जनाधार लगातार सिमटता गया है। 2015 में 27 विधायकों वाली पार्टी 2020 में 19 सीटों पर पहुंची और 2025 के चुनाव में महज 6 सीटों पर सिमट गई। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम और विधानमंडल दल के नेता डॉ. शकील अहमद खान तक चुनाव हार गए। ऐसे में राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि पार्टी को फिर से जनता के बीच कैसे खड़ा किया जाए।दूसरी तरफ कांग्रेस का अंदरूनी इख्तिलाफ भी खुलकर सामने आ चुका है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह ने प्रभारी अल्लावरु पर हार का ठीकरा फोड़ते हुए संगठन की कार्यशैली पर सवाल उठाए, तो जवाब में डॉ. शकील अहमद खान ने अखिलेश पर ही चुनावी नाकामी का तंज कस दिया। यानी कांग्रेस के भीतर सियासी तल्खी अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुकी है।

राहुल गांधी सामाजिक न्याय, ओबीसी भागीदारी और जिसकी जितनी भागीदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी की राजनीति को आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन बिहार कांग्रेस का एक धड़ा अब भी पारंपरिक समीकरणों की वकालत करता दिख रहा है। यही वैचारिक टकराव राहुल के मिशन को और मुश्किल बना रहा है।महागठबंधन भी कांग्रेस के लिए आसान राह नहीं है। पार्टी के भीतर लगातार यह आवाज उठ रही है कि राजद के साथ रहने से कांग्रेस का जनाधार और संगठन दोनों कमजोर हुए हैं। वहीं, पप्पू यादव की बढ़ती लोकप्रियता, तेजस्वी यादव के साथ उनका टकराव और कांग्रेस में उनकी भूमिका भी नई सियासी बहस का विषय है। राहुल गांधी को यह तय करना होगा कि वे गठबंधन की सियासत को प्राथमिकता देंगे या कांग्रेस को अपने दम पर खड़ा करने की रणनीति अपनाएंगे।

उधर, सत्ता पक्ष में अब सम्राट चौधरी की आक्रामक राजनीति कांग्रेस के लिए नई चुनौती बनकर उभरी है। ऐसे में राहुल गांधी के पटना दौरे पर सिर्फ कांग्रेस कार्यकर्ताओं ही नहीं, बल्कि पूरे बिहार की सियासी निगाहें टिकी होंगी। यह दौरा तय करेगा कि कांग्रेस बिहार में फिर से संघर्ष की राह पकड़ती है या अंदरूनी कलह और गठबंधन की मजबूरियों के बीच उसका सियासी वजूद और सिमटता चला जाता है।