E20 petrol: E20 पेट्रोल की नई नीति से महंगे हो सकते हैं अंडे और चिकन, जानें वजह

E20 petrol: E20 पेट्रोल के लिए इथेनॉल खरीद नीति का असर मक्के, मुर्गियों के चारे, चिकन और अंडों की कीमतों पर पड़ सकता है। जानें नई नीति से आपकी जेब पर क्या असर होगा।

E20 petrol: भारत में पेट्रोल में 20 फीसदी इथेनॉल मिलाने यानी E20 पेट्रोल का इस्तेमाल बढ़ाने के लिए सरकार इथेनॉल की खरीद कर रही है। लेकिन इसका असर सिर्फ गाड़ियों के ईंधन तक सीमित नहीं रह सकता। इथेनॉल बनाने में मक्का का इस्तेमाल बढ़ने से खेती, मुर्गियों के चारे और खाने-पीने की चीजों की कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।


मक्का मुर्गियों के चारे का एक अहम हिस्सा है। अगर ज्यादा मक्का इथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होने लगेगा, तो पोल्ट्री उद्योग के लिए चारा महंगा हो सकता है। इससे आगे चलकर चिकन और अंडों की कीमतें बढ़ने की आशंका है। हालांकि, कीमतों में कितनी बढ़ोतरी होगी, यह मक्के की उपलब्धता और बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा।


क्या है सरकार की नई इथेनॉल खरीद नीति?


तेल कंपनियों ने 2026-27 के सप्लाई वर्ष के लिए करीब 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल खरीदने के लिए बोलियां मांगी हैं। नई खरीद व्यवस्था में गन्ने के रस, सिरप और B-हैवी मोलासेस से बनने वाले इथेनॉल को शामिल नहीं किया गया है। मोलासेस चीनी बनाने के दौरान बचने वाला गाढ़ा पदार्थ होता है। इससे भी इथेनॉल बनाया जाता है। सरकार के इस फैसले का उद्देश्य चीनी बनाने में इस्तेमाल होने वाले गन्ने को इथेनॉल उत्पादन की ओर ज्यादा मोड़ने से रोकना है। इस नीति के तहत तेल कंपनियों को इथेनॉल की जरूरत पूरी करने के लिए मक्का और C-हैवी मोलासेस जैसे दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ सकता है। इससे मक्के की मांग बढ़ने की आशंका है।


मक्के से इथेनॉल बनाना क्यों पड़ सकता है महंगा?


इथेनॉल बनाने के लिए मक्का और गन्ने से निकलने वाले पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है। इनसे तैयार इथेनॉल की कीमत अलग-अलग होती है। दिए गए आंकड़ों के मुताबिक, मक्का से बनने वाले इथेनॉल की खरीद कीमत 68.86 रुपये प्रति लीटर है। वहीं, B-हैवी मोलासेस से बनने वाले इथेनॉल की कीमत 60.73 रुपये प्रति लीटर बताई गई है। इस हिसाब से मक्का आधारित इथेनॉल करीब 13.4 फीसदी महंगा पड़ता है। अगर तेल कंपनियां मक्का आधारित इथेनॉल ज्यादा खरीदती हैं, तो उनकी लागत बढ़ सकती है। हालांकि, तेल कंपनियों का कुल खर्च कितना बढ़ेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे अलग-अलग स्रोतों से कितना इथेनॉल खरीदती हैं और बाजार में इसकी कीमत क्या रहती है।


चिकन और अंडे महंगे होने का खतरा क्यों?


मक्का पोल्ट्री उद्योग में मुर्गियों के चारे के लिए इस्तेमाल होने वाला एक प्रमुख अनाज है। दिए गए आंकड़ों के अनुसार, भारत में पैदा होने वाले मक्के का करीब 55 से 60 फीसदी हिस्सा पोल्ट्री उद्योग इस्तेमाल करता है। अगर इथेनॉल बनाने वाली कंपनियां ज्यादा मक्का खरीदने लगती हैं, तो पोल्ट्री उद्योग के लिए इसकी उपलब्धता कम हो सकती है। मांग बढ़ने और आपूर्ति कम होने पर मक्के की कीमत बढ़ सकती है।


ऐसा होने पर मुर्गियों का चारा तैयार करने का खर्च भी बढ़ेगा। पोल्ट्री कारोबारियों की लागत बढ़ने पर इसका असर चिकन और अंडों की खुदरा कीमतों पर पड़ सकता है। हालांकि, यह जरूरी नहीं है कि इथेनॉल उत्पादन बढ़ते ही चिकन और अंडे महंगे हो जाएं। इसका असर मक्के की पैदावार, आयात, दूसरी चारा सामग्री की उपलब्धता और बाजार में मांग पर भी निर्भर करेगा।


आपकी जेब पर क्या असर पड़ सकता है?


अगर मक्के की मांग बढ़ने से उसकी कीमत में लगातार बढ़ोतरी होती है, तो इसका असर मुर्गियों के चारे और पोल्ट्री कारोबार की लागत पर पड़ सकता है। इसके बाद चिकन और अंडों की कीमतों में बदलाव देखने को मिल सकता है। दूसरी ओर, इथेनॉल का इस्तेमाल बढ़ाने से पेट्रोल में जीवाश्म ईंधन की जगह कुछ हिस्सा दूसरे स्रोत से पूरा किया जा सकता है। लेकिन इससे उपभोक्ताओं को पेट्रोल सस्ता मिलेगा या गाड़ियों के माइलेज में कितना बदलाव होगा, यह अलग-अलग बातों पर निर्भर करता है, इसलिए इथेनॉल नीति का असर केवल पेट्रोल की कीमत से नहीं मापा जा सकता। इसमें किसानों की आमदनी, मक्के की मांग, चारे की लागत और खाने-पीने की चीजों के दाम भी महत्वपूर्ण हैं।


क्या खाद्य महंगाई बढ़ना तय है?


नहीं, सिर्फ इथेनॉल की मांग बढ़ने से खाद्य महंगाई बढ़ना तय नहीं है। अगर मक्के की पैदावार अच्छी रहती है और बाजार में पर्याप्त अनाज उपलब्ध होता है, तो इथेनॉल उद्योग और पोल्ट्री उद्योग दोनों की जरूरतें पूरी हो सकती हैं, लेकिन अगर मक्के की आपूर्ति मांग के मुकाबले कम पड़ती है, तो कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में सरकार के सामने ऊर्जा की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ पशुओं के चारे और खाद्य पदार्थों की कीमतों को नियंत्रित रखने की चुनौती भी होगी।