Shambhu Girls Hostel: छात्रा की मौत पर CCTV बनाम पुलिस की कहानी, शंभू गर्ल्स हॉस्टल के बंद दरवाज़ों के पीछे क्या छुपा है राज? कटघरे में पुलिस की कहानी , पढ़िए 2 घंटे की साज़िश का सच !

शंभू गर्ल्स हॉस्टल का महज़ 10 मिनट 54 सेकेंड का CCTV फुटेज इस वक्त पूरी जांच व्यवस्था पर हथौड़े की तरह बरस रहा है। ....

शंभू गर्ल्स हॉस्टल कांड में कटघरे में पुलिस की कहानी- फोटो : social Media

Shambhu Girls Hostel:पटना में नीट की तैयारी कर रही छात्रा के रेप और मौत के मामले में अब ऐसा मोड़ आया है, जिसने पुलिस की शुरुआती थ्योरी को फिर से कटघरे में खड़ा कर दिया है। शंभू गर्ल्स हॉस्टल का पहला CCTV फुटेज सामने आया है, जिसने पूरे केस की तस्वीर को हिला कर रख दिया है। इस फुटेज में एक शख्स अचेत अवस्था में छात्रा को गोद में उठाकर ले जाता हुआ साफ दिखाई दे रहा है। सूत्रों के मुताबिक यह वही CCTV फुटेज है, जो छात्रा को हॉस्पिटल ले जाने के दौरान रिकॉर्ड हुआ। कैमरे में हॉस्टल की कई अन्य लड़कियां भी नजर आ रही हैं। कोई भाग-दौड़ करता दिखता है, कोई इधर-उधर झांकता है पूरा माहौल अफरा-तफरी और घबराहट से भरा हुआ है। यह फुटेज सिर्फ एक मूवमेंट नहीं, बल्कि उस वक्त के हालात का खामोश गवाह बन गया है।मामला तब उजागर हुआ, जब चित्रगुप्तनगर इलाके के शंभू गर्ल्स हॉस्टल में जहानाबाद जिले की रहने वाली छात्रा अपने कमरे में बेहोश पाई गई। छात्रा नीट मेडिकल एंट्रेंस की तैयारी कर रही थी। उसे आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया, जहां 11 जनवरी को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पीड़िता के परिवार ने सीधे तौर पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया, लेकिन पटना पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों, एसएचओ रौशनी कुमारी, एएसपी स्तर तक ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने तक स्पष्ट सबूत न होने की बात कहकर शुरुआती दौर में आरोपों को सिरे से नकार दिया।शंभू गर्ल्स हॉस्टल का महज़ 10 मिनट 54 सेकेंड का CCTV फुटेज इस वक्त पूरी जांच व्यवस्था पर हथौड़े की तरह बरस रहा है। यह फुटेज किसी एक घटना की तस्वीर नहीं, बल्कि पुलिस की कार्यशैली पर लिखा गया इल्ज़ामनामा बन चुका है। अपराध की दुनिया में कहा जाता है सबूत बोले तो सियासत और सिस्टम दोनों खामोश हो जाते हैं, और यहां कैमरे ने वही किया है।

इस मामले में पुलिस की लापरवाहियां अब खुद एक चार्जशीट की शक्ल ले चुकी हैं। चित्रगुप्तनगर थानेदार रौशनी कुमारी तीन दिन बाद हॉस्टल पहुंचती है, तब तक क्या सुबूत हवा नहीं किए जा सकते थे। छात्रा के कपड़े जब्त नहीं किए गए, जो किसी भी यौन अपराध की जांच में सबसे अहम कड़ी होते हैं। पहले दिन एसएचओ रौशनी कुमारी की जगह ड्राइवर को मौके पर भेजना जांच का मज़ाक उड़ाने जैसा था। सवाल है कि एसएचओ रौशनी कुमारी ने  हॉस्टल सील क्यों नहीं किया, कमरा सुरक्षित क्यों नहीं खा गया।

प्रभात अस्पताल की रिपोर्ट आंख मूंदकर मान ली गई, पीएमसीएच में इलाज तक नहीं कराया गया। पुलिस के बड़े अफसरान ने पोस्टमॉर्टम से पहले ही रेप से इनकार और नींद की गोली से मौत की थ्योरी उछाल दी गई। कार्रवाई में देरी हुई, रिपोर्ट आने के बाद ही हरकत दिखी और अंत में पीएमसीएच पर शक कर केस एम्स भेज दिया गया। एसएचओ रौशनी कुमारी ने प्रभात हॉस्पीटल से नीलम अग्रवाल को पुलिस गाड़ी में बैठा कर थाने से क्यों छोड़ दिया?

शंभू गर्ल्स हॉस्टल का महज़ 10 मिनट 54 सेकेंड का CCTV फुटेज इस वक्त पूरी जांच व्यवस्था पर सवालिया निशान बनकर खड़ा है। कैमरे ने जो दिखाया, वह सिर्फ़ एक बेहोश छात्रा को बाहर ले जाने का दृश्य नहीं है, बल्कि यह फुटेज पुलिस, SIT और प्रशासन की बनाई गई टाइमलाइन को एक-एक कर ज़मीन पर पटकता नजर आता है। अपराध की दुनिया में कहा जाता है“वक़्त ही सबसे बड़ा गवाह होता है”,और यहां वही वक़्त पुलिस की गर्दन पकड़कर खड़ा है।

पुलिस की शुरुआती थ्योरी कहती है कि छात्रा को दोपहर 2 बजे अस्पताल ले जाया गया। मगर CCTV कुछ और ही बयान देता है। फुटेज के मुताबिक 6 जनवरी को 3:50 बजे छात्रा के केबिन के बाहर हलचल शुरू होती है। 3:58:55 पर गेट खुलता है, और 4:01:30 बजे छात्रा को बेहोशी की हालत में गोद में उठाकर बाहर ले जाया जाता है। यानी 4 बजे तक छात्रा हॉस्टल में मौजूद थी। सवाल सीधा है अगर 4 बजे तक छात्रा हॉस्टल में थी, तो 2 बजे अस्पताल पहुंचने की कहानी कहां से गढ़ी गई? यह फर्क सिर्फ मिनटों का नहीं, पूरे 2 घंटे का है, और यही 2 घंटे पूरी मेडिकल और कानूनी प्रक्रिया को उलट-पुलट करने के लिए काफी हैं।

पुलिस ने यह भी दावा किया कि छात्रा को दरवाजा तोड़कर बाहर निकाला गया। लेकिन CCTV में दिखता है कि एक लड़की टेबल पर चढ़ती है, ऊपर से हाथ डालती है और कुंडी खोल देती है। न कोई तोड़फोड़, न कोई ज़बरदस्ती। यह दृश्य पुलिस के “दरवाजा तोड़ने” वाले बयान से मेल नहीं खाता। इसका मतलब साफ है दरवाजा ऊपर से खोला और बंद किया जा सकता है। तो क्या किसी को पहले से यह राज़ मालूम था? क्या 5 जनवरी की रात साढ़े 9 बजे से 6 जनवरी शाम 4 बजे के बीच कोई उस कमरे में गया था? इस एंगल पर न पुलिस के पास जवाब है, न फॉरेंसिक सबूत।

अगर कुंडी ऊपर से खुली, तो सवाल और गहरे हो जाते हैं दरवाजा अंदर से बंद था या बाहर से? कुंडी की ऊंचाई, लॉक मैकेनिज्म और हैंडल की स्थिति की फॉरेंसिक जांच बेहद जरूरी थी, लेकिन जांच फाइलों में ऐसी किसी रिपोर्ट का जिक्र तक नहीं मिलता। यह चूक नहीं, बल्कि लापरवाही की जड़ लगती है।

CCTV में छात्रा को बेहोशी की हालत में उठाकर ले जाते देखा जा सकता है। ऐसे हालात में किसी भी हॉस्टल का पहला नियम होता है पुलिस और एम्बुलेंस को तुरंत सूचना। मगर यहां फैसला लिया गया कि पहले “अपने स्तर” पर काम किया जाएगा। सवाल उठता है किसने तय किया कि पुलिस को कॉल नहीं किया जाएगा? क्या किसी ने जानबूझकर देरी करवाई? अगर एक कॉल समय पर हो जाती, तो शायद क्राइम सीन सुरक्षित रहता।

दरवाजा खुलते ही हॉस्टल के कमरे में आवाजाही शुरू हो जाती है। कोई पानी लाता है, कोई कंबल, कोई रोता है। कुछ ही देर में हॉस्टल खाली हो जाता है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि तीन दिन तक कमरे को क्राइम सीन मानकर सील नहीं किया गया। न एंट्री-लॉग बना, न सबूत सुरक्षित हुए। या तो पुलिस को देर से खबर दी गई, या खबर मिलने के बाद भी आंख मूंद ली गई।

फुटेज में कई किरदार हैं पहले लड़कियां, फिर महिलाएं और बाद में एक पुरुष। कोई निर्देश देता दिखता है, कोई चुपचाप आदेश मानता है। लेकिन जांच में आज तक यह साफ नहीं किया गया कि फैसले किसने लिए। वह लड़का कौन था, जो छात्रा को उठाकर ले गया? उसने किस आधार पर कहा कि “लड़की सो रही होगी”?

अब तक वही CCTV सामने आया है जो 3:50 के बाद का है। इससे पहले क्या हुआ, क्यों नहीं दिखाया जा रहा? क्या पहले का फुटेज किसी और कहानी की ओर इशारा करता है? जब मामला इतना संगीन है, तो पूरा सच सामने लाना ही इकलौता इंसाफ़ है। कम से कम मां-बाप को तो यह हक़ मिलना चाहिए कि वे देखें कमरे में जाने के बाद, हर एक मिनट में आखिर हुआ क्या?