Bihar Flood: 80 साल की आजादी फिर भी शव को कंधे पर लेकर नदी पार करने की मजबूरी, सिस्टम से ग्रामीणों का सवाल

Bihar Flood: आजादी के 80 साल बाद भी हालात ऐसे हैं कि जिंदा इंसान तो दूर, मुर्दों को भी आखिरी सफर के लिए नदी पार करनी पड़ती है।

80 Years After Independence Villagers Still Swim With Corpse
डीएम साहेब! एक पुल बनवा दीजिए- फोटो : reporter

Bihar Flood: आजादी के 80 साल का जश्न हमने 15 दिन पहले हीं मनाया है। मुल्क ने तरक्की के तमाम दावे किए, गांवों तक सड़क, बिजली और दूसरी बुनियादी सहूलियतें पहुंचाने की बातें हुईं, लेकिन किशनगंज के बहादुरगंज प्रखंड की यह तस्वीर सिस्टम के विकास के दावों पर गंभीर सवालिया निशान लगा रही है। यहां आज भी लोग एक अदद पुल के इंतजार में हैं और हालात ऐसे हैं कि जिंदा इंसान तो दूर, मुर्दों को भी आखिरी सफर के लिए नदी पार करनी पड़ती है।

किशनगंज जिले के बहादुरगंज प्रखंड क्षेत्र के नोदिया टोली-बैसा घाट पर खकवा नदी के ऊपर अब तक पुल नहीं बन सका है। नतीजा यह है कि दर्जनों गांवों के हजारों लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए नदी पार करनी पड़ती है। बरसात में जब नदी का मिजाज तल्ख होता है और पानी का जलस्तर बढ़ जाता है, तब यही सफर जानलेवा बन जाता है। सबसे दर्दनाक तस्वीर तब सामने आती है, जब किसी गांव में किसी की मौत हो जाती है। बैसा कब्रिस्तान से जुड़े दर्जनों गांवों के लोगों के सामने जनाजे को नदी पार कराने के लिए कंधे पर शव उठाकर पानी में उतरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। हाल ही में सड़क हादसे में जान गंवाने वाली 20 वर्षीय शहनसवी बेगम, पिता सईदुर्रहमान, ग्राम बीरपुर के शव को भी इसी तरह खकवा नदी पार कर बैसा कब्रिस्तान ले जाना पड़ा। परिजनों और ग्रामीणों ने कंधे पर शव उठाया और नदी के पानी के बीच से होकर अंतिम मंजिल तक पहुंचे। यह मंजर न सिर्फ झकझोर देने वाला है, बल्कि बुनियादी सुविधाओं की बदहाली की जीती-जागती तस्वीर भी है।

ग्रामीणों का कहना है कि सामान्य दिनों में भी नदी पार करना मुश्किल है, लेकिन बरसात के मौसम में मुश्किल कई गुना बढ़ जाती है। नदी का जलस्तर बढ़ने के साथ तेज बहाव का खतरा बना रहता है। ऐसे में बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और बीमार लोगों के लिए नदी पार करना बेहद जोखिम भरा हो जाता है।स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों के मुताबिक, पुल निर्माण को लेकर कई बार अधिकारियों से फरियाद की जा चुकी है। कई मौकों पर स्थल निरीक्षण भी हुआ, लेकिन इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। हर बार उम्मीद बंधती है कि अब शायद पुल का ख्वाब पूरा होगा, लेकिन वक्त गुजरता गया और ग्रामीणों की मुसीबत जस की तस बनी रही।

यह सवाल सिर्फ एक पुल का नहीं है। सवाल यह है कि जब देश आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर और तरक्की की बात कर रहा है, तब एक इलाके के हजारों लोगों को आज भी नदी के रहम-ओ-करम पर अपनी जिंदगी और अपनों की आखिरी रस्में पूरी करनी पड़ रही हैं।ग्रामीणों की मांग बेहद सीधी और जायज है “डीएम साहेब, हमारे यहां पुल बना दीजिए।” उनका कहना है कि कम से कम किसी इंसान को अपने किसी अजीज के जनाजे को कंधे पर लेकर नदी तैरकर पार करने की नौबत न आए।

अब देखना यह है कि बहादुरगंज की यह दर्दनाक तस्वीर प्रशासन और हुकूमत की नजर कब तक पहुंचती है और नोदिया टोली-बैसा घाट पर पुल का अधूरा ख्वाब आखिर कब हकीकत बनता है।