भूमिहार ब्राह्मण नाम पर सियासी घमासान, RTI ने खोली फाइलों की परत, आयोग बोला-नाम बदलने की सिफारिश हुई ही नहीं

Bhumihar Brahmin: भूमिहार ब्राह्मण से ब्राह्मण शब्द हटाने की सिफारिश आखिर किसने की? इस सवाल ने विधानसभा से लेकर सड़क तक सियासी घमासान मचा रखा है।...

Dr Ramanand Pandey Siwan
भूमिहार ब्राह्मण नाम पर सियासी घमासान- फोटो : social Media

Bhumihar Brahmin: बिहार की सियासत में जातीय पहचान से जुड़ा एक पुराना विवाद अब सरकारी फाइलों और आरटीआई के दस्तावेजों तक पहुंच गया है। ‘भूमिहार ब्राह्मण’ से ‘ब्राह्मण’ शब्द हटाने की सिफारिश आखिर किसने की? इस सवाल ने विधानसभा से लेकर सड़क तक सियासी घमासान मचा रखा है। इसी बीच सूचना के अधिकार यानी RTI से सामने आई जानकारी ने सरकारी दावे पर ही सवालिया निशान लगा दिया है।

विवाद की शुरुआत 24 जुलाई को विधानसभा में हुई, जब भाजपा विधायक और पूर्व मंत्री जीवेश मिश्रा ने जमीन से जुड़े दस्तावेजों में जाति का नाम ‘भूमिहार ब्राह्मण’ दर्ज करने की मांग उठाई। जवाब में सरकार की ओर से उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि सवर्ण आयोग की सिफारिश के बाद ही ‘भूमिहार ब्राह्मण’ का नाम बदलकर ‘भूमिहार’ किया गया था और इसे दोबारा बदलने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है।

लेकिन अब आरटीआई के जवाब में उच्च जातियों के विकास के लिए राज्य आयोग, जिसे पहले सवर्ण आयोग के नाम से जाना जाता था, ने इस दावे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आयोग की ओर से स्पष्ट किया गया है कि उसकी संचिका में ऐसा कोई उल्लेख मौजूद नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आद्री की रिपोर्ट सामान्य प्रशासन विभाग को भेजी गई थी। यानी जिस रिपोर्ट को वर्ष 2015 से नाम बदलने के सरकारी दावे का आधार बताया जाता रहा, उसकी फाइलों में ही आगे भेजे जाने का कोई रिकॉर्ड नहीं मिलने की बात सामने आई है। इस खुलासे ने पूरे मामले को नया मोड़ दे दिया है।

उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने कहा कि विधानसभा में उन्होंने वही बात रखी जो सामान्य प्रशासन विभाग के अधिकारियों की ओर से उन्हें बताई गई थी। उनके मुताबिक विभागीय जानकारी में यही दर्ज था कि सवर्ण आयोग की अनुशंसा पर ‘भूमिहार ब्राह्मण’ का नाम बदलकर भूमिहार किया गया।

वहीं आयोग के चेयरमैन डॉ. महाचंद्र प्रसाद सिंह ने इस दावे को सीधे तौर पर खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्होंने पूरी फाइल की पड़ताल करवाई है और सवर्ण आयोग ने कभी ‘भूमिहार ब्राह्मण’ का नाम बदलकर भूमिहार करने की अनुशंसा नहीं की। उन्होंने यह भी कहा कि ‘भूमिहार ब्राह्मण’ होने से जुड़े साक्ष्य और दस्तावेज सामान्य प्रशासन विभाग को भेजे जा चुके हैं।

अब सवाल सिर्फ एक जाति के नाम का नहीं, बल्कि सरकारी फाइलों में दर्ज दावों और वास्तविक रिकॉर्ड के बीच के फासले का है। एक तरफ विधानसभा में सरकारी बयान, दूसरी तरफ आरटीआई से सामने आई जानकारी और आयोग के चेयरमैन का खंडन इन तीनों ने बिहार की सियासत में नया विवाद खड़ा कर दिया है। आखिर किस फाइल के आधार पर नाम बदला गया और वह सिफारिश कहां है? यही सवाल अब सियासी गलियारों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक गूंज रहा है।