राम मंदिर चढ़ावा चोरी विवाद ! पहली बार बीजेपी के हाथ में आई RSS की गर्दन, दबाकर मुक्त होगी भाजपा या बचाकर हैट्रिक लगा देंगे योगी, पढ़िए अंतर्द्वंद्व की इनसाइड स्टोरी

Ram Mandir : राष्ट्रीय राजनीति के शतरंज पर एक बार फिर 'अयोध्या' और 'राम मंदिर' धुरी बन चुके हैं। पढ़िए राम मंदिर दान विवाद के बहाने RSS और BJP के अंतर्द्वंद्व की इनसाइड स्टोरी.....

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RSS और BJP का अंतर्द्वंद्व- फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : वर्तमान में राष्ट्रीय राजनीति के शतरंज पर एक बार फिर अयोध्या राम मंदिर है। वही राम मंदिर जिसे मुद्दा बना बीजेपी सत्ता के चरम पर पहुंची। आज की राजनीतिक विडंबना देखिए मंदिर की बिसात पर पनप रही राजनीति में सत्ता ही पक्ष और विपक्ष दोनों ओर से खेल रही है। लाख कोशिश करने के बावजूद विपक्षी पार्टियों के लिए राम मंदिर चढ़ावा मामला में जगह बनाना मुश्किल हो रहा है। इसके लिए जिम्मेदार विपक्ष का अतीत है। तो क्या?  यह मान लिया जाए कि 2014 से देश की सत्ता की शिखर पर बैठी बीजेपी मंदिर के बहाने अपने ही श्लाका पुरुषो को लीलने लगी है? या ये मान लिया जाए कि 12 साल से सत्ता पर कब्जा जमाए बीजेपी में वक्त ने जंग लगा दिया और अब इस जंग के साथ बीजेपी का क्षरण भी यहीं से शुरू होगा? क्योंकि अगर जंग लगे लोहे के बर्तन से जंग को झाड़ा जाए तो संकट बर्तन के वजूद पर भी होता है। या, इसे वर्तमान बीजेपी और आरएसएस के बीच के संघर्ष के तौर पर देखा जाए? 

संकटमोचन राममन्दिर

देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हो रहा है जब एक नहीं दो नहीं बल्कि कई चेहरे जो आरएसएस की तपोभूमि से निकले हैं और वो राम भक्तों की नजर में दागदार होते जा रहे हैं। इस देश में राम भक्तों का महत्व क्या है इस बात को देश की राजनीति से बेहतर कोई नहीं समझता। बीजेपी की बैतरणी राम नाम के आसरे ही सत्ता तक पहुंची और राम मंदिर का विरोध का ही नतीजा था और है कि कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष सत्ता के लिए संघर्ष की ताकत भी खोते जा रही है। राम मंदिर दान चोरी मसले पर जो चेहरे शक संदेह के दायरे में हैं, वे सभी संघ की पृष्ठभूमि से हैं। इतना ही नहीं, ये संघ के कर्ताधर्ताओं की सूची में वरिष्ठ माने जाते हैं। पहला नाम चंपत राय बंसल का है... ये शख्स वे उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले के रहने वाले हैं और पहले केमिस्ट्री के प्रोफेसर थे। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रचारक के रूप में अपना जीवन समर्पित किया। वे दशकों से राम जन्मभूमि आंदोलन और राम मंदिर के निर्माण की देखरेख में सबसे आगे रहे हैं। दूसरा नाम अनिल मिश्रा है.. डॉ. अनिल मिश्र पेशे से होम्योपैथिक डॉक्टर हैं। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के अवध प्रांत के सह-प्रांत कार्यवाह भी रह चुके हैं। डॉ. अनिल मिश्र श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के पूर्व सदस्य और रामलला प्राण प्रतिष्ठा समारोह के मुख्य यजमान थे। राम मंदिर के दान-पात्र से रकम गायब होने के विवाद में नाम आने के बाद उन्होंने ट्रस्टी पद से इस्तीफा दे दिया। फिलहाल इस मामले की जांच जारी है। तीसरा नाम गोपाल राव है... अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मंदिर में गोपाल राव एक बेहद प्रभावशाली प्रशासनिक और अनौपचारिक व्यवस्थापक के रूप में कार्यरत रहे हैं। मूल रूप से कर्नाटक के रहने वाले गोपाल राव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के पूर्व प्रांत प्रचारक और विश्व हिंदू परिषद (VHP) के केंद्रीय सह मंत्री हैं। वे मंदिर के दैनिक आयोजनों, पुजारियों के प्रबंधन, भोग व्यवस्था और प्रशासनिक कार्यों को संभालते रहे हैं। 

अब राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी की सरकार को देखिए.. 

हाशिए पर खड़ा विपक्ष अपनी भूमिका निभाने में नाकाम दिखता है। ऐसी स्थिति में सत्ता को डर किसी और से नहीं बल्कि अपनी मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ से ही है। पिछले लोकसभा चुनाव के समय तो बीजेपी और संघ के बीच की दूरी सतह पर दिखने लगी थी। पार्टी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष ने मंच से बाकायदा ऐलान कर दिया कि बीजेपी को संघ के मदद की आवश्यकता नहीं। इसका नतीजा उत्तर प्रदेश के साथ ही संघ की गोद (महाराष्ट्र) में भी भाजपा को भुगतना पड़ा। 2024 लोकसभा चुनाव में अबकी पार 400 पार का नारा देने वाली पार्टी अपने बुते बहुमत के लिए तरस गई। 

शुरू हुआ संघम् शरणं गच्छामी...  

लोकसभा चुनाव के परिणाम में भाजपा के श्लाका पुरुषो के होश ठिकाने पर ला दिए। फिर तस्वीर बदलने लगी जिसमें राम मंदिर प्रांगण में राम ध्वाजारोहण के दिन संघ के सर्वे सर्वा मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक साथ आरती की थाल थामे हुए दिखे। संघ को लेकर भाजपा अध्यक्ष ही नहीं बल्कि पार्टी के लिए पर्याय और अपरिहार्य बन चुके पीएम मोदी की भाषा भी सहलाने वाली हो गई। परिणाम महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से लेकर पश्चिम बंगाल के विधान सभा चुनाव तक दिखा। लोकसभा चुनाव में दोनों राज्यों में सम्मानजनक सीट पाने के लिए हांफने वाली भाजपा विधानसभा चुनाव में भारी बहुमत के साथ जीत का जश्न मनाने लगी। लेकिन भाजपा के पर्याय बन चुकी गुजराती जोड़ी के लिए आरएसएस का नियंत्रण खटक रह था। समय ने ली करवट और राम मंदिर चढ़ावा मामला में सीधे चोरी ना करने के बावजूद मीडिया के निशाने पर वो ही आ गये जो मंदिर में आएसएस के प्रतिनिधि माने जाते हैं। मीडिया जितना तेजी से इनका नाम उछाल रही है और अभियुक्तों के साथ इनकी जुगलबंदी साबित कर रही है। ये यौंकाने वाला है। क्योंकि आज की तारीख में विपक्ष मीडिया को गोदी/मोदी मीडिया कहता है। मीडिया के निशाने पर संघ है।  पहली बार आरएसएस सत्ता और जनता जनता दोनों के निशाने पर है। इसके पहले बापू की हत्या   से लेकर राम मंदिर आंदोलन तक संघ सत्ता के लिए खलनायक और जनता के बीच नायक बना रहा। पहली बार संघ की गर्दन सत्ता की हाथ में है। 

अब उपाय क्या है.. 

संघ की छटपटाहट का बीजेपी मंद मंद मजा लेगी। लेकिन संघ को बेदाग साबित करना बीजेपी की मजबूरी भी है। अगर संघ आम राम भक्तों के बीच हद से अधिक बदनाम हुआ तो संकट भाजपा की पहचान पर भी होगा। इस बीच एक कड़ी और है। वो है उत्तर प्रदेश की सरकार। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री सीधे तौर पर संघ और बीजेपी दोनों को खटकते हैं। दोनों के शीर्ष पुरुष इनको नहीं पसंद करते। योगी आदित्यनाथ अगामी विधानसभा चुनाव में हर हाल में तीसरी जीत दर्ज कर इतिहास में मोदी से आगे की लकीर खींचना चाहते हैं। अब एक बात और गौरतलब है। विधि व्यवस्था राज्य का मसला है। राज्य योगी आदित्यनाथ के पास है। अब अगर संघ के लिए योगी खड़े हो जाते हैं तो योगी के लिए जीत का हैट्रिक लगाना आसान हो जाएगा। क्योंकि संघ के पास नि:स्वार्थ कार्यकर्ताओं की लंबी फौज है, जो राष्ट्र के नाम पर संघ के लिए बिना पता लिखे पोस्ट कार्ड की तरह हैं। संघ जहां का पता उनके नाम पर लिख दे, अगली सुबह कार्यकर्ता अपनी जिम्मेदारी को निभाने के लिए उस पते पर मुस्तैद मिलेंगे। 

योगी और क्या कर सकते हैं? 

योगी की पुलिस जांच की आंच में संघ के तीनों वरीय को अपने लपेटे में ले सकती है। इससे जनता के बीच योगी की कड़क छवि और मजबूत होगी। क्राइम पर नो कंप्रोमाइज की जो छवि योगी आदित्यनाथ ने अपने लिए गढ़ा है और और गाढ़ा होगा। मैसेज जाएगा कि चुनावी साल में भी योगी ब़ड़े लोगों पर हाथ डालने से नहीं कतरा रहे हैं। आम जन में जय जय होगी। संघ की अधिक बदनामी होने पर मोदी और शाह की टीम भी योगी को पुचकारने की कोशिश करेंगे। क्योंकि संघ की हद से अधिक बदनामी पूरी भाजपा के लिए घातक होगी। योगी एक तीर से केंद्र और केंद्रीय शक्ति दोनों को नियंत्रण में ले लेंगे।  लेकिन इसका सबसे बड़ा नुकसान पार्टी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ेगा। भाजपा के कार्यकर्ताओं को काम करने के लिए मानसिक/बौद्धिक खाद पानी संघ ही देता रहा है। एक सीमा के बाद संघ, भाजपा और विश्व हिन्हू परिषद तीनों आपस में गड्ड मड्ड हो जाते हैं। 

आपस में उलझे रामलला के सिपाही 

कुलमिलाकर रामलला की लीला में राम लला के तीनों सिपाही आपस में ही उलझ गये हैं। चोरी करना पाप है मंत्र का जाप करते करते चोरी ही जीवन का ऑक्सिजन बन गया किसी को नहीं पता। संघ जिस ईमानदारी के लिए जाना जाता था आज देश की मीडिया उस ईमानदारी को हर दिन तीन बार नंगा कर रहा है। केंद्र सरकार मौन होकर इसे देख रही है। राज्य की सरकार मौन होकर चोरों को बचाने और चबाने का खेल कर रही है। ये कर्म से कुकर्म तक के सफर का परिणाम है। राम की प्रतिमा अभी भी वैसे ही मुस्कुरा रही है जैसे पहले मुस्कुराते हुए भक्तों को दर्शन देती थी। सत्ता की चौसर पर आजादी के समय से ही राम थे। आज सत्ता की चौसर पर राम भक्त हैं। जनता की आस्था राम पर अनादी काल से थी है और रहेगी। जनता की निगाहों में गिर वो रहे हैं जो राम ध्वज वाहक बने थे। गलतियों पर राजनीति अपना घर बनाती है ये शाश्वत सत्य है। लेकिन हर राजनेता को याद रहना चाहिए सत्ता सनातन नहीं है, राम सनातन है। राम को बदनाम करने वाला इतिहास के पन्नों में दफ़न हो जाता है। 

धीरेन्द्र कुमार के फेसबुक वाल से साभार