पटना हाई कोर्ट ने धारा 107 की कार्रवाई को बताया मौलिक अधिकारों पर हमला,कहा—बिना ठोस आधार के नहीं छिन सकती नागरिक की स्वतंत्रता
Patna High Court:पटना हाई कोर्ट ने एक अहम और दूरगामी असर वाले फ़ैसले में साफ़ कर दिया है कि किसी भी नागरिक के खिलाफ यूँ ही दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 के तहत कार्रवाई शुरू करना,मौलिक अधिकार का सीधा उल्लंघन है।
Patna High Court: पटना हाई कोर्ट ने किसी नागरिक के खिलाफ दंड प्रक्रिया की धारा 107 की प्रक्रिया शुरू करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिली मौलिक अधिकार का हनन करार दिया है।कोर्ट ने कहा कि किसी नागरिक के जीवन और स्वतंत्रता को इस प्रकार संकुचित या प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जितेंद्र कुमार की एकलपीठ ने आवेदक के खिलाफ शुरू की गई कार्रवाई को निरस्त करते हुये हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को आदेश की एक प्रति संबंधित कार्यपालक दंडाधिकारी और राज्य सरकार के मुख्य सचिव को भेजने का आदेश दिया। ताकि कार्यपालक दंडाधिकारी अपने अधिकारों के बारे में जानकारी रख सकें।
गौरतलब है कि नौगछिया के सहायक जिला आपूर्ति (ग्रोसेरी) ने 3 अप्रैल, 2021 को कार्यपालक दंडाधिकारी को पत्र संख्या 243 भेज आवेदक के खिलाफ धारा 107 सीआरपीसी के तहत कार्यवाही प्रारंभ करने का निर्देश दिया।
आवेदक पर आरोप लगाया गया कि वह पीडीएस डीलरों को परेशान करता है और उनसे पैसे की मांग करता है, और पैसे न देने पर उन्हें झूठे मामलों में फंसाने की धमकी देता है। जांच में यह बात भी सामने आई कि आपूर्ति विभाग और शिक्षा विभाग के विभिन्न विद्यालयों को धमकी दी और पैसे की मांग की, जिसके कारण कर्मचारी और पीडीएस डीलर आवेदक से भयभीत रहते थे।
जिसके आधार पर कार्यपालक दंडाधिकारी ने क्षेत्र में शांति भंग होने की संभावना व्यक्त की और को शांति बनाए रखने के लिए आवेदक को एक वर्ष की अवधि के लिए दो ज़मानतों के साथ एक लाख रुपये का बांड निष्पादित करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि आवेदक के खिलाफ 107 सार्वजनिक शांति और व्यवस्था भंग होने की आशंका उत्पन्न होने का कोई केस नहीं बनता हैं।अधिक से अधिक भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत दंडनीय गंभीर अपराध का केस होना चाहिए था। उस पर ऐसे अपराधों के लिए मुकदमा चलाया जाना चाहिए था।कोर्ट ने आवेदक के खिलाफ दर्ज केस को निरस्त कर दिया।