अगर आप बनना चाहते हैं तो इंटीरियर डिज़ाइनर, तो जानिए जिया सुल्तानिया की नज़र में कैसे बनेगा कैरियर , वैश्विक रुझानों से पटना को क्या सीखना होगा, करियर, शहर और सुलभता का पढ़िए पूरा फ़लसफ़ा
Career in Interior Design: पटना की रहने वाली इंटीरियर डिजाइनर जिया सुल्तानिया, जिन्होंने न्यूयॉर्क में इंटीरियर डिज़ाइन का अध्ययन किया है, मानती हैं कि वैश्विक शहरों से सीखने का सबसे बड़ा सबक पहुंच है...
Career in Interior Design: तेज़ी से बदलती दुनिया में इंटीरियर डिज़ाइन अब सिर्फ़ ख़ूबसूरती या लग्ज़री का नाम नहीं रहा। यह करियर, समाज और शहरों के भविष्य से जुड़ा एक गंभीर विमर्श बन चुका है। पटना की रहने वाली इंटीरियर डिज़ाइनर जिया सुल्तानिया, जिन्होंने न्यूयॉर्क में इंटीरियर डिज़ाइन का अध्ययन किया है, मानती हैं कि वैश्विक शहरों से सीखने का सबसे बड़ा सबक पहुंच यानी एक्सेसिबिलिटी है न कि केवल ऊँची इमारतें या चमकदार इंटीरियर्स।
जिया कहती हैं कि न्यूयॉर्क जैसे शहरों में पढ़ाई के दौरान उन्हें यह समझ में आया कि दुनिया के बड़े शहर आवाजाही, रोज़मर्रा की ज़िंदगी और इंसानों की ज़रूरतों के बारे में कितनी बारीकी से सोचते हैं। वहीं से उनके मन में यह सवाल पैदा हुआ कि पटना जैसे शहर अपने निवासियों की सेवा आलोचना के बजाय जिज्ञासा और संवेदना के साथ कैसे कर सकते हैं। इस सोच की जड़ें उनके निजी अनुभव में हैं। उनकी दादी, जिनकी उम्र बढ़ने के साथ चलना-फिरना मुश्किल हो गया है, उनके लिए पटना में बाहर निकलना किसी इम्तिहान से कम नहीं। व्हीलचेयर का इस्तेमाल लगभग नामुमकिन है, और पूजा स्थल या सार्वजनिक जगहों तक पहुँचना भारी योजना और मशक्कत मांगता है।

जिया सुल्तानिया का साफ़ तर्क है शहरों का विकास केवल रफ़्तार से नहीं, बल्कि पहुँच से मापा जाना चाहिए। अच्छा डिज़ाइन महँगा या दिखावटी होना ज़रूरी नहीं। असल में यह इस बात का पैमाना है कि कोई इंसान कितनी आसानी से किसी जगह में दाख़िल हो सकता है, वहां चल सकता है और बिना थके या ख़ुद को अलग-थलग महसूस किए वापस निकल सकता है। आज कई वैश्विक शहर डिज़ाइन को वेल-बीइंग, स्थिरता और सुलभता के नज़रिए से देख रहे हैं।
पटना जैसे शहरों में यह सोच ख़ासतौर पर भीड़-भाड़ वाली जगहों में ज़रूरी हो जाती है। बाज़ार, सड़कें, दफ़्तर और पूजा स्थल—भीड़, शोर और अव्यवस्था से भरे रहते हैं। बहुतों के लिए यह सामान्य है, लेकिन बुज़ुर्गों, दिव्यांगों या सीमित गतिशीलता वाले लोगों के लिए यह हालात डरावने और कभी-कभी असंभव हो जाते हैं। जिया बताती हैं कि आज भी कई जगहों पर रैंप के बिना सीढ़ियाँ, संकरे दरवाज़े, फिसलन भरी फ़र्श और आराम करने के लिए बैठने की जगहों का अभाव है। ये सिर्फ़ वास्तुशिल्प खामियाँ नहीं, बल्कि लोगों के अपनेपन की भावना पर चोट हैं।
उनके मुताबिक़, डिज़ाइन परंपरा या आध्यात्मिक अनुभव को नुकसान पहुँचाए बिना भी बदला जा सकता है। चरण-मुक्त प्रवेश, स्पष्ट रास्ते, नॉन-स्लिप फ़र्श, हैंड्रिल और सोच-समझकर रखी गई बैठने की जगहें हर किसी के लिए स्थान को बेहतर बना सकती हैं। त्योहारों और भीड़ के समय समझदारी से की गई आंतरिक योजना अराजकता को सुरक्षा में बदल सकती है।
जिया यह भी रेखांकित करती हैं कि वैश्विक डिज़ाइन प्रथाएं अब दिखावे से ज़्यादा मूवमेंट प्लानिंग पर ध्यान दे रही हैं लोग अलग-अलग समय और मानसिक दबाव में किसी जगह से कैसे गुज़रते हैं। विकासशील शहरों के लिए यह सोच बेहद उपयोगी है, जहाँ विकास अक्सर बुनियादी ढांचे से तेज़ होता है।
स्थिरता पर बात करते हुए जिया कहती हैं कि बार-बार तोड़ने और बनाने के बजाय मौजूदा संरचनाओं को मज़बूत करना, रोशनी और हवा में सुधार लाना और स्थानीय सामग्रियों का इस्तेमाल ज़्यादा टिकाऊ है। पटना के पास शिल्प और स्थानीय सामग्री की समृद्ध विरासत है, जिसे अपनाना एक समझदारी भरा क़दम होगा।
आख़िर में जिया सुल्तानिया का मानना है कि पटना को बेहतर बनने के लिए न्यूयॉर्क बनने की ज़रूरत नहीं। उसे ऐसे स्थानों की ज़रूरत है जो यह समझें कि लोग असल में कैसे जीते हैं ख़ासतौर पर वे, जो धीमी चाल से चलते हैं या जिन्हें सहारे की ज़रूरत होती है। विचारशील इंटीरियर डिज़ाइन हर समस्या का हल नहीं, लेकिन यह तय ज़रूर करता है कि शहर किसके लिए है।