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भारतीय राजनीति के अजातशत्रु भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी- बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

भारतीय राजनीति के अजातशत्रु भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी- बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

पटना-  हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है 

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा



 जी हजारों साल में एक वाजपेयी जैसा स्वनाम धन्य व्यक्ति पैदा होता है. राजनीति की कर्मभूमि में अटल बिहारी वाजपेयी ने जो लकीर खींचीं हैं वो हमेशा हम सबको प्रेरित करती रहेंगी .काल के कपाल पर लिखता हूं मिटाता हूं मैं गीत नया गाता हूं ...ये कविता है  भारतीय राजनीति के अजात शत्रु कहे जाने वाले भारत रत्न से सम्मानित और भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और कवि अटल बिहारी वाजपेयी का जिनकी पुण्य तिथि 16 अगस्त को है.वाजपेयी पहली बार 1957 में संसद के सदस्य के रूप में चुने गए थे.1977 में भारतीय जनसंघ ने तीन अन्य पार्टियों को मिलाकर गठन किया. जनता पार्टी ने ऐसी सरकार का नेतृत्व किया जो जुलाई 1979 तक चली. जनता सरकार में विदेश मंत्री के रूप में, वाजपेयी ने पाकिस्तान और चीन के साथ संबंधों में सुधार के लिए काम किया. 1980 में, जनता पार्टी में विभाजन के बाद, वाजपेयी ने भारतीय जनसंघ से खुद को अलग कर भारतीय जनता पार्टी  के रूप में नए जल के पुनर्गठित करने में मदद की. 



भाजपा के संस्थापक अध्यक्ष थे वाजपेयी

1980 में भाजपा की स्थापनी हुई और अटल बिहारी वाजपेयी इसके संस्थापक अध्यक्ष बने. अटल बिहारी वाजपयी बलरामपुर, ग्वालियर, नई दिल्ली, विदिशा, गांधीनगर और लखनऊ लोकसभा सीट से 9 बार चुनाव जीतकर संसद पहुंचे. इसके अलावा वे राज्यसभा के दो बार सदस्य भी रहे.मई 1996 में वाजपेयी ने प्रधान मंत्री के रूप में शपथ ली, लेकिन अन्य दलों से समर्थन हासिल करने में विफल रहने के बाद उन्होंने  केवल 13 दिन में ही इस्तीफा सौंप दिया. 1998 की शुरुआत में वह फिर से प्रधान मंत्री बने, चुनावों में भाजपा ने रिकॉर्ड संख्या में सीटें जीतीं, लेकिन उन्हें क्षेत्रीय दलों के साथ अस्थिर गठबंधन बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा. 1999 में भाजपा ने संसद में अपनी सीटें बढ़ाईं और सरकार पर अपनी पकड़ मजबूत की.



पिता पुत्र दोनों ने एक साथ की लॉ की पढ़ाई

अटल बिहारी  के पूर्वजों का संबंध आगरा के बटेश्वर गांव से था और इनके दादा पंडित श्याम लाल वाजपेयी, आगरा से मध्य प्रदेश में जाकर बस गए थे.वाजपेयी पढ़ाई में काफी तेज हुआ करते थे और इन्होंने राजनीति विज्ञान में प्रथम श्रेणी में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल की हुई थी.अटल जी ने कानपुर के विश्वविद्यालय में वकालत की पढ़ाई करने के लिए दाखिला लिया था. सबसे बड़ी बात की इस कॉलेज में इनके साथ इनके पिता ने भी दाखिला लिया और पढाई के दौरान होस्टल में पिता पुत्र ने एक ही कमरा साझा किया.



पत्रकार बनना चाहते थे वाजपेई

अटल विहारी वाजपेयी एक पत्रकार बनना चाहते थे और इन्होंने कई अखबारों में कार्य भी किया हुआ है.- राष्ट्र धर्म, पंचजन्य, दैनिक समाचार, वीर अर्जुन और स्वदेश अखबार में  इन्होंने कार्य किया . अटल ने कुछ समय बाद पत्रकारिता छोड़ दी थी और ये राजनीति में आ गए थे.



 राजनीति में नहीं आना चाहते थे

अटल  का नाम भारत के बेहतरीन हिंदी कवियों में गिना जाता है और एक साक्षात्कार में इन्होंने माना  भी था कि इन्हें राजनीति में कोई रुचि नहीं थी और ये हमेशा से एक कवि बनना चाहते थे.एक राजनेता बनने के बाद भी अटल जी कविताएं लिखा करते थे और जब भी ये भाषण दिया करते थे तो इनके भाषण में कविताएं सुनने के जरूर मिलती थी.



संयुक्त राष्ट्र में पहली बार हिंदी में बोला था

अटल पहले  ऐसे व्यक्ति भी थे, जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र के अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहली बार हिंदी भाषा में भषण दी थी. अटल बिहारी वाजपेयी की प्रशंसा भारत के प्रथन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने भी की थी.



पहली बार विदेश मंत्री बने थे वाजपेई

अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 1975 में तत्कालीन प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के खिलाफ जयप्रकाश नारायण  द्वारा शुरू किए गए संपूर्ण क्रांति आंदोलन में भाग लिया था. साल 1977 में इंदिरा गांधी सरकार से टक्कर लेने के लिए इनकी जनसंघ पार्टी ने जनता पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया था.साल 1977 में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में इनकी पार्टी को जीत मिली. इस जीत के साथ ही देसाई ने अटल बिहारी वाजपेयी को केंद्रीय मंत्री बना दिया था और इन्हें विदेश मामलों का मंत्रालय मिला था. बतौर विदेश मंत्री रहते हुए, वाजपेयी जी ने विदेश में हिंदी भाषा में स्चीप दी थी. साल 1979 मोरारजी देसाई की सरकार गिर गई थी और इसके कारण वाजपेयी जी को भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था.



अटल बिहारी वाजपेई का राजनीतिक सफर

अटल बिहारी वाजपेई 1996 में 13 दिन के लिए तो 1998 में 13 महीने के लिए प्रधानमंत्री बने. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी कुल मिलाकर 47 साल तक संसद के सदस्य रहे. वह 10 बार लोकसभा और दो बार राज्यसभा के लिए चुने गए. वह 1984 में लोकसभा चुनाव हारे थे जब कांग्रेस के माधवराव सिंधिया ने ग्वालियर में उन्हें करीब दो लाख वोटों से शिकस्त दी थी.वाजपेयी ने 10वीं, 11वीं, 12वीं, 13वीं और 14वीं लोकसभा में 1991 से 2009 तक लखनऊ का प्रतिनिधित्व किया. दूसरी और चौथी लोकसभा के दौरान उन्होंने बलरामपुर का नेतृत्व किया, पांचवीं लोकसभा के लिए वह ग्वालियर से चुने गए जबकि छठीं और सातवीं लोकसभा में उन्होंने नयी दिल्ली का प्रतिनिधित्व किया.वाजपेयी 1962 और 1986 में राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. मुंबई में पार्टी की एक सभा में दिसंबर 2005 में वाजपेयी ने चुनावी राजनीति से अपने को अलग करने की घोषणा की. वह करीब 47 सालों तक सांसद रहे. वाजपेयी 1996 से 2004 के बीच तीन बार प्रधानमंत्री भी रहे. पहली बार 13 दिन के लिए, फिर 1998 और 1999 के बीच 13 महीनों के लिए और फिर 1999 से 2004 तक .वाजपेयी जी ने 13 अक्टूबर 1999 को पीएम पद के लिए शपत ली थी और वो साल 2004 तक पीएम पद पर बने रहे थे. ये प्रथम बार था कि जब किसी नॉन कांग्रेस नेता ने अपना कार्यकाल पूरे पांच साल तक सफलतापूर्ण किया था.



कई सम्मानों से नवाजे गए

अटल बिहारी वाजपेयी को कई सम्मनों से नवाजा गया था जिनमें  भारत सरकार ने 1992 में उन्हें पद्म विभूषणसे सम्मानित किया.तो कानपुर विश्व विद्यालय ने 1993 में  डॉक्टर ऑफ लेटर से सम्मानित किया. वहीं 1994 में लोकमान्य तिलक पुरस्कार तो 1994 में  उत्कृष्ट संसदीय पुरस्कार 1994 भारतीय संसद द्लाका दिया गया. यहीं नहीं  भारत रत्न पंडित गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार पुरस्कार से वे नवाजे गए. साल 2014 में उन्हें भारत के सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया. तो वर्ष 2015 में ही  बांग्लादेश लिबरेशन वार सम्मान मिला.



परमाणु परीक्षण

राजनीति के अजात शत्रु  माने जाने वाले वाजपेयी ने पीएम रहते भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया .प्रधानमंत्री के रूप में वाजपेयी जी के दूसरे कार्यकाल में मई, 1998 में राजस्थान में परमाणु परीक्षण किया गया था. इस परीक्षण के सफल होने के साथ ही भारत की गिनती भी उन देशों में होने लगी, जिनके पास परमाणु बम थे.1998 में भारत द्वारा कई परमाणु हथियारों के परीक्षण की पश्चिमी देशो ने आलोचना की और अपमानजनक रुख अपनाया. कई प्रतिबंध भारत पर लगा दिए गए,लेकिन अटल तो अटल थे . वे किसी दबाव के ागे नहीं झुके और बाद में उनकी जीत हुई और प्रतिबंध पश्चिमी देशों को वापस लेना पड़ा.



चतुर्भुज परियोजना सहित कई योजनाएं लागू हुईं

2000 में उनकी सरकार ने कई प्रमुख राज्य-संचालित उद्योगों से सार्वजनिक धन के विनिवेश का एक व्यापक कार्यक्रम शुरू किया. 2003 में वाजपेयी ने कश्मीर क्षेत्र पर पाकिस्तान के साथ भारत के लंबे समय से चल रहे विवाद को सुलझाने के लिए एक ठोस प्रयास किया. उनके नेतृत्व में, भारत ने स्थिर आर्थिक विकास हासिल किया , और देशसूचना प्रौद्योगिकी में विश्व नेता बन गए , हालांकि भारतीय समाज के गरीब वर्ग अक्सर आर्थिक समृद्धि से वंचित महसूस करते थे. इसके अलावा वाजपेयी सरकार के दौरान स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना, टेलीकाम नीति भी लागू की गई।. 2004 में संसदीय चुनाव में उनका गठबंधन हार गया और उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया.



दिल्ली-लाहौर बस सेवा की शुरुआत

पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने के लिए कार्य वाजपेयी जी ने पाकिस्तान के साथ पीस (PEACE) स्थापित करने के लिए कई कदम उठाए थे और इन्हीं कदमों में से एक कदम दिल्ली-लाहौर बस सेवा थी. इस बस सेवा को फरवरी, 1999 में शुरू किया गया था और इस बस सेवा को शुरू करने का मकसद दोनों देशों के बीच दोस्ती का रिश्ता बनाना था.बस सेवा के अलावा कश्मीर मुद्दों को हल करने के लिए भी कई तरह की वार्ता वाजपेयी  की सरकार द्वारा पाकिस्तान के साथ की गई थी. 



कारगिल युद्ध 

 पाकिस्तान ने कारगिल युद्ध शुरू करके भारत सरकार द्वारा दोनों देशों के बीच में शांति स्थापित करने के लिए की जाने वाली सारी कोशिशों पर पानी फेर दिया था.वाजपेयी की सरकार के समय हुए कारगिल युद्ध में भारत की विजय हुई थी और इस युद्ध को जीत कर वाजपेयी जी ने अपने आपको सफल प्रधानमंत्री साबित कर दिया था



प्लेन हाईजैक

वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे उसी वक्त काठमांडू से नई दिल्ली आने वाले एक प्लेन को हाईजैक कर लिया गया था. इस प्लेन में काफी संख्या में भारतीय नागरिक सवार थे और इन सबकी जान के बदले आतंकवादियों ने भारत सरकार से आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर को छोड़ने की मांग रखी थी. लोगों की जान बचाने के लिए वाजपेयी जी ने मौलाना मसूद अजहर सहित कई आतंकवादियों को रिहा कर दिया था और वाजपेयी के इस फैसले की निंदा की गई थी. 



भारतीय संसद पर हमला 

साल 2001 में जब भारतीय संसद पर हमला हुआ था उस वक्त वाजपेयी जी जी हमारे देश के पीएम थे. साथ ही इनके कार्यकाल के दौरान ही गुजरात में दंगे भी हुए थे और इन दंगों की वाजपेयी जी ने आलोचना की थी.



राजनीति के अजातशत्रु थे वाजपेई

वाजपेयी जी को हमेशा से ही एक साफ नेता के तौर पर देखा जाता है और इनके साथ किसी भी तरह का विवाद नहीं जुड़ा हुआ है.  जिस वक्त बाबरी ढ़ोचे को गिराया गया था, उस वक्त वाजपेयी की भूमिका पर भी सवाल खड़े किए गए थे.



अटल बिहारी वाजपेयी ने साल 2005 के अंत में राजनीति से संन्यास की घोषणा की. दिसंबर 2014 के अंत में उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान, भारत रत्न से सम्मानित किया गया. साल 2018 में 16 अगस्त को दिल्ली के एम्स अस्पताल में उनका निधन हो गया था. राजनीय राजनीति के धुरंधर पंडित अटल बिहारी वाजपेई की पुण्यतिथि पर शत शत नमन.




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