बिहार लोकायुक्त ने 'निगरानी' से कराई जांच तो फट गया 'सुशासन' का ढोल, गड़बड़ी रोकने के लिए अब 10 प्वाइंट्स का गाइडलाइन

बिहार लोकायुक्त ने 'निगरानी' से कराई जांच तो फट गया 'सुशासन' का ढोल, गड़बड़ी रोकने के लिए अब 10 प्वाइंट्स का गाइडलाइन

PATNA: बिहार लोकायुक्त ने सुशासन राज के इंजीनियरिंग सिस्टम की पोल खोल दी है। निगरानी विभाग से जांच के बाद भारी गड़बड़ी का खुलासा हुआ है। पोल खुलने के बाद 16 विभाग के अपर मुख्य सचिव,प्रधान सचिव,सचिव को पत्र लिख इंजीनियरिंग कार्य में सुधार करने को कहा गया है। निगरानी विभाग के अपर मुख्य सचिव ने 16 डिपार्टमेंट को पत्र लिखकर 10 बिंदूओं पर सुधार करने को कहा है।

फट गया 'सुशासन' का ढोल

निगरानी विभाग के अपर मुख्य सचिव आमिर सुबहानी ने योजना एवं विकास विभाग,शिक्षा विभाग,जल संसाधन विभाग समेत अन्य विभागों को पत्र लिख निगरानी जांच में मिली गड़बड़ी पर ध्यान आकृष्ट कराया है। पत्र में 10 बिंदुओं पर सुधार करने को कहा गया है. अपर मुख्य सचिव ने अपने पत्र में उल्लेख किया है कि लोकायुक्त के सदस्य(न्यायिक) द्वारा 23 फरवरी 2021 को पारित आदेश में यह निर्देश दिया गया था कि निगरानी विभाग द्वारा पाई गई अनियमितताओं को ध्यान में रखना होगा. ताकि कोई गलती फिर से नहीं हो .साथ ही यह भी निर्देश दिया गया है कि निगरानी विभाग द्वारा एक नीति मूलक परिपत्र जारी किया जाए. इस आलोक में भविष्य में किसी योजना के कार्यान्वयन में गड़बड़ी नहीं हो सके। इसके लिए बिहार लोक निर्माण संहिता एवं अन्य नियमावली का अनुपालन सुनिश्चित करें. 

10 प्वाइंट्स पर 16 विभागों को पत्र

निगरानी जांच में पाया गया कि संबंधित योजना के मूल योजना के कार्यान्वयन के क्रम में आवश्यक समझे गए मिट्टी भराई,समतलीकरण कार्य के लिए मूल योजना में ही आवश्यक पुनरीक्षण अपेक्षित था. परंतु इसके बजाय मिटटी भराई कार्य को एक पृथक एवं स्वतंत्र कार्य के रूप में अलग प्राक्कलन तैयार कर तकनीकी एवं प्रशासनिक स्वीकृति प्रदान की गई . प्राक्कलन गठन से लेकर स्वीकृति तक की प्रक्रिया से संबंधित पदाधिकारी द्वारा इसे ध्यान में रखा जाना था . डीपीआर के गठन-स्वीकृति के समय स्थलीय स्थिति का ध्यान नहीं रखा गया. प्रशासकीय विभाग द्वारा योजना की प्रशासनिक स्वीकृति के पूर्व भवन निर्माण विभाग का परामर्श प्राप्त नहीं किया गया. प्राक्कलन की तकनीकी स्वीकृति टुकड़े-टुकड़े में बांटकर प्रदान की गई. जबकि संपूर्ण प्राक्कलन राशि की तकनीकी स्वीकृति सक्षम स्तर से अपेक्षित थी. कार्य को नियमानुसार निविदा के माध्यम से कराने के बजाय विभागीय तौर पर कराया गया और विभागीय रूप से कार्य कराने में भी नियमों की पूर्णता अनदेखी की गई. मिटटी भराई कार्य के पूर्व नियमानुसार लेवल दर्ज नहीं किया गया. कार्य में समुचित पर्यवेक्षण का अभाव था. कार्य की भौतिक प्रगति का बिना जांच के ही कार्यकारी एजेंसी को राशि विमुक्त की जाती रही. एक बड़ी राशि बिना कार्य कराए ही लंबी अवधि यानी 6 वर्षों तक कार्यकारी एजेंसी के पास पड़ी रही. जिला पदाधिकारी, कला संस्कृति विभाग द्वारा इसका ससमय प्रबोधन अपेक्षित था .



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