पुस्तक समीक्षा : फिल्म प्रेमियों के लिए पॉइंट ऑफ अटैक है प्रशांत रंजन की 'सिनेशास्त्र'

पुस्तक समीक्षा : फिल्म प्रेमियों के लिए पॉइंट ऑफ अटैक है प्रशांत रंजन की 'सिनेशास्त्र'

PATNA : सिनेमा विधा से जुड़ी हजारों पुस्तक लिखी गयी है। इसके बावजूद प्रशांत रंजन की लिखी सिनेशास्त्र काफी अलग है। जहां सिनेमा पर लिखे अधिकतर पुस्तक सिनेमा के टेक्निकलपार्ट और इस विधा के विभिन्न पहलुओं पर बात करता है, जो खासकर सिनेमा के क्षेत्र संबंधित, या उसमें रुचि लेने वाले लोगों तक ही सीमित होता है। वहीं यह पुस्तक सिनेमा को लेकर एक आम जन के दिलोदिमाग में उठ रहे सवालों का जवाब देने के साथ—साथ सिनेमा को देखकर सोचना सिखाती है। अगर हम इस पुस्तक के शीर्षक की बात करें, तो “सिनेशास्त्र...क्योंकि सीखने की चीज है सिनेमा” इस पुस्तक के अनुरूप बेहद ही सटीक बैठती है। यह पुस्तक बार-बार इस बात पर जोर डालती है कि सिनेमा देखना भी एक सीखने चीज है, बिल्कुल वैसे ही जैसे बचपन में खाना खाने के लिए सीखना, खड़ा होना और चलना। जिसके लिए अभ्यास जरूरी होता है। सही सिनेमा ही देखना क्यों जरुरी है, इस बारे में भी पुस्तक प्रकाश डालती है। अपनी आने वाली पीढ़ी को सिनेमा के बुरे प्रभाव से कैसे बचाएं, इस बारे में भी 'सिनेशास्त्र' बात करती है। 

किसी भी क्षेत्र में आने से पहले आपको एक पॉइंट ऑफ अटैक मिलता है, जिसके बाद आप अपनी गति में इज़ाफ़ा महसूस करते हुए उस क्षेत्र में खुद को साबित करने के लिए निकल पड़ते हैं। यह किताब वही पॉइंट ऑफ अटैक है, जिसे पढ़ने के पश्चात सिनेमा को समझने और उसे देखने को लेकर पाठक एक बदलाव महसूस करता है और उसपर सोचना प्रारम्भ करता है। यह किताब उस वर्ग को खासा ध्यान में रखकर लिखी गयी है, जो या तो पाठक के रूप में शुरुआती हों या फिर सिनेमा को लेकर जो बहुत ही सजग नहीं हैं। या यूं कहें कि सिनेमा को महज एक विधा मानते हैं। इसके कहने का पहला कारण तो यह है कि यह बेहद आसान भाषा में लिखी गई है। कुछ टेक्निकल शब्दों का प्रयोग जहां किया गया है, लेखक ने उसे आम भाषा में समझाने की भरपूर कोशिश की है। इसके बावजूद लांग शॉट, वाइडशॉट जैसे शब्द उस पाठक को थोड़ा परेशान कर सकते हैं, जो फिल्मों या फोटोग्राफी की भाषा से बिल्कुल अनजान हैं।

इसके साथ ही 112 पन्नों की पुस्तक को 27 अलग-अलग अध्याय में बांटा गया है, जो एक दूसरे से जुड़े होने के साथ नए पाठकों पर पढ़ने के लिए दबाव नहीं डालते। साथ ही लेखक ने जिस बातचीत वाली शैली का इस्तेमाल अपने लेखन में किया है, वह भी पाठक को अपनी ओर बांधे रखता है। इस पुस्तक में सिनेमा से संबंधित उन सारी बातों का जवाब मिलता है, जो एक आम व्यक्ति सिनेमा को लेकर कभी सोचता है। जैसे: सही सिनेमा क्या है?, इसकी पहचान कैसे हो? हमें किस तरह की फिल्में देखनी चाहिए? हमें बच्चों को किस तरह की फिल्में दिखानी चाहिए आदि। साथ ही कैसे अच्छी फिल्में देखने की आदत को विकसित कर सकते हैं? इसके साथ लेखक पाठक वर्ग का ध्यान फ़िल्म साक्षरता की ओर ले जाते हैं, जहां यह भी बताने की कोशिश है कि यह क्यों जरूरी है? किताब के एक अंश में लेखक लिखते हैं “फ़िल्म अध्ययन जहां ऐतिहासिक, सैद्धान्तिक, सामाजिक और तकनीकी पहलुओं को लेकर सूक्ष्म व गंभीर बात करता है, वहीं फिल्म साक्षरता सिनेमा के सामाजिक एवं मानवीय पहलुओं को जनसमूह में रोचक ढंग से संप्रेषित करता है”। भारत अभी सिनेमाई साक्षरता की दिशा में उस हिसाब से आगे नहीं बढ़ा है। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि प्रशांत रंजन ने इस क्षेत्र के भविष्य को भांप लिया है। अगले 5 या 10 वर्षों में जब सिनेमाई साक्षरता लोकप्रिय होगी, तब इस पुस्तक का महत्व और बढ़ जाएगा। 

सिनेमा का किसी मानव मस्तिष्क पर और समाज पर क्या प्रभाव पड़ता है और कैसे? सिनेमा से शिक्षा किस तरह संभव है? इस पर भी यह किताब संक्षिप्त रूप में बात करती हुई फ़िल्म निर्माण पर हल्की चर्चा के साथ समाप्त होती है। हालांकि अगर आपको फिल्मों की विशेष समझ है और आप इसके टेक्निकलपार्ट से भी वाकिफ़ हैं, तो यह किताब आपको थोड़ा निराश इस मामले में कर सकती है कि आपको इससे कुछ ज्यादा सीखने को नहीं मिलेगा। यह किताब शुद्ध रूप से एक गैर सिनेमाई बैकग्राउंडर और आम इंसान के लिए लिखी गयी है, जो सिर्फ सिनेमा देखता हो, उसके बारे में ज्यादा कुछ जानता नहीं हो। पर इसकी खासियत यह है कि इसे किसी भी उम्र के पाठक पढ़ सकते हैं, जिन्हें सिनेमा को और सिनेमा से कुछ सीखने की इच्छा हो। इस पुस्तक के लेखक प्रशांत रंजन की यह चौथी प्रकाशित पुस्तक है। वह बिहार के प्रसिद्ध युवा फ़िल्म निर्देशक और फ़िल्म समीक्षक हैं, जिन्होंने कई डॉक्यूमेंट्री और शॉर्ट फिल्मों का निर्माण किया है। 

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