नेपाल-भारत एनर्जी ट्रेड से बनेगा खुशहाली का रास्ता-अश्विनी अशोक

नेपाल-भारत एनर्जी ट्रेड से बनेगा खुशहाली का रास्ता-अश्विनी अशोक

NEWS4NATION DESK : भारत और नेपाल सदियों से ऐतिहासिक मित्रता और रोटी-बेटी जैसे प्रगाढ़ संबंधों की डोरी से बंधे हुए हैं. हाल के वर्षों में अंतर्देशीय व्यापार भी बढ़ा है, लेकिन इसमें सबसे खास है ऊर्जा के क्षेत्र में ‘सबनेशनल एनर्जी ट्रेड’ यानि बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के स्तर पर नेपाल के साथ ऊर्जा व्यापार और विनिमय. राजनीति में उतार-चढाव के बावजूद दोनों देशों के नीति-निर्माताओं में इस बात की सहमति है कि एनर्जी आर्थिक विकास और सामाजिक प्रगति का आधारस्तम्भ है. इसलिए पिछले कई दशकों से इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन लाइन के लिहाज से कई परियोजनाएं काम कर रही हैं, जैसे कटैया-कुसहा, रक्सौल-परवानीपुर, टनकपुर-महेन्द्रनगर, रामनगर-गंडक, मुजफ्फरपुर-ढालकेबार, लुमकी-बरेली लाइन आदि प्रमुख हैं. इनमें ज्यादातर बिहार के उत्तरी भाग और सीमांचल क्षेत्र में हैं और उत्तर प्रदेश के उत्तर-पूर्वी इलाके में भी हैं. नेपाल के साथ सबनेशनल एनर्जी ट्रेड के लिहाज से बिहार और उत्तर प्रदेश सबसे ज्यादा प्रासंगिक राज्य हैं, क्योंकि भारत की ओर से इनकी सीमा नेपाल के साथ सबसे ज्यादा लगती हैं और दोनों तरफ से सांस्कृतिक आदान-प्रदान और व्यापारिक आवागमन का प्राचीन इतिहास रहा है. 

चूँकि अब नीति और कार्यक्रमों के स्तर पर स्वच्छ और सततशील ऊर्जा का जोर सबसे ज्यादा है. ऐसे में नेपाल की हाइड्रो पावर सम्पदा भारत के एनर्जी मिक्स के लिहाज से सबसे बेहतर है. क्योंकि नेपाल में ऊर्जा के पारम्परिक रूपों जैसे कोयला आदि जीवाश्म ईंधन का भण्डार कम है. वहीँ दुर्गम पहाड़ी इलाकों और हिमालय पर्वत श्रृंखला के कारण वहां पनबिजली परियोजनाओं से ऊर्जा उत्पादन की क्षमता काफी ज्यादा है, जो नेपाल में 86 गीगावाट (GW) की सम्भावना आंकी गयी है. दूसरी ओर भारत में पारम्परिक ऊर्जा स्रोत के अलावा सोलर में 750 गीगावाट उत्पादन की सम्भावना है. 

भारत-नेपाल सब-नेशनल एनर्जी ट्रेड

सब-नेशनल एनर्जी ट्रेड का मुख्य आधार यह है कि नेपाल मुख्य रूप से हाइड्रो पावर के मामले में धनी राष्ट्र है और यूपी और बिहार सौर ऊर्जा के मामले में अग्रणी हैं. तकनीकी तौर पर नेपाल में 86 गीगावाट की सम्भावना है. नेपाल में ऊर्जा मांग सम्बन्धी आकलन वर्ष 2040 तक करीब 37500 GWh है, जबकि भारत में वर्ष 2036 तक करीब 480 GW गीगावाट है. इसी तरह बिहार और उत्तर प्रदेश के जरिए ऊर्जा के आदान-प्रदान की बेहतरीन संभावनाएं है. जैसे यूपी में 23 GW और बिहार में 11 GW गीगावाट की सोलर ऊkर्जा सम्भावना है. सब-नेशनल एनर्जी ट्रेड को गति देने के मामले में दोनों ओर मौसम संबंधी कारक है, जैसे मानसून के सीजन में बिहार और यूपी में सोलर उत्पादन कम होता है, वहीँ खूब बारिश के हालात में नेपाल में हाइड्रो पावर का खूब उत्पादन होता है और इससे पैदा ऊर्जा का आयात किया जा सकता है. वहीँ दूसरी ओर पीक गर्मी के सीजन में सोलर का ज्यादा उत्पादन होता है और ऐसे समय में बिहार/यूपी राज्य से सोलर ऊर्जा को नेपाल को निर्यात कर वहां ऊर्जा की कमी को पाटा जा सकता है. इस तरह सरल शब्दों में कह जाए तो दोनों पक्ष ऊर्जा स्रोतों का आपसी आदान-प्रदान कर एक दूसरे के हाथ मजबूत कर सकते हैं और विकास के सहभागी बन सकते हैं. भारत और नेपाल के बीच सब-नेशनल एनर्जी ट्रेड के लिए सबसे तार्किक चीज़ है कि दोनों देश एक दूसरे के उन ऊर्जा स्रोत का आपसी विनिमय करें, जो एक दूसरे के पूरक बने और दोनों को आत्मनिर्भर बनाये.

ठोस पॉलिसी और संस्थागत रेगुलेटरी ढांचा की आवश्यकता 

एनर्जी ट्रेड की असीम संभावनाओं के बावजूद दोनों सरकारों की तरफ से नीतिगत स्तर पर काफी कुछ किया जाना है. अभी इसे सुगम बने के लिए एक रेगुलेशन है, लेकिन समुचित गाइडलाइन्स और संस्थागत ढांचे और ठोस नीतिगत प्रयासों की सबसे ज्यादा आवश्यकता है, ताकि यह स्थायी प्रक्रिया बने. दोनों देशों के बीच इसे सुगम बनाने के लिए कॉमन कमिटी और टास्कफोर्स होने चाहिए, जो इस एनर्जी ट्रेड को मजबूत बनाये. इसमें दोनों देशों के बिज़नेस एसोसिएशन, एनर्जी कंपनियों, सरकारी ऊर्जा वितरण एवं उत्पादन कंपनियों (जैसे डिस्कॉम्स) की विविध चरणों में बड़ी भूमिका होगी. इसमें कोई संदेह नहीं कि  दोनों देशों में गरीबी और बेरोज़गारी दूर कर आजीविका और उद्यमिता को बढ़ावा देकर आर्थिक प्रगति को तेज किया जा सकता है. दरअसल एनर्जी ट्रेड एक ऐसा माध्यम है, जो दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक मित्रता को नया आयाम देगा और खुशहाली का द्वार भी खोलेगा.

लेखक सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड एनर्जी डेवलपमेंट (सीड) में हेड-रिन्यूएबल एनर्जी है.

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