बालिका वधु बनी डॉक्टर : आठ साल की उम्र में हुई गांव में हुई शादी और अब बन गई MBBS डॉक्टर, प्रेरित करती है यह कहानी

बालिका वधु बनी डॉक्टर : आठ साल की उम्र में हुई गांव में हुई शादी और अब बन गई MBBS डॉक्टर,  प्रेरित करती है यह कहानी

मैं भैंसों को पानी देने लगी थी। दरअसलगेहूं की कटाई का टाइम है न, यह बातें एक एमबीबीएस डॉक्टर द्वारा कही गई

DESK : राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में आज भी छोटी उम्र में बच्चियों की शादी करा दी जाती है। ऐसी ही एक बालिक वधू है रूपा यादव, वह सिर्फ आठ साल की थी, जब उसकी शादी करा दी गई। लेकिन, इस बालिका वधू की जिंदगी में आनेवाला साल बिल्कुल अलग था, उसके लिए समाज की बेड़िया बाधा नहीं बनी। बालिका वधु से आज रूपा MBBS डॉक्टर बन गई है। लेकिन, डॉक्टर बनने का उसका यह सफर किसी भी लड़की के लिए प्रेरित करनेवाला है। 


बहन के देवर से हो गई थी शादी

एमबीबीएस डॉक्टर बन चुकी रुपा यादव की शादी महज आठ साल की उम्र में हो गई थी। राजस्थान के एक छोटे से गांव, करीरी (जिला सपुरा) में एक सबल किसान परिवार में जन्मीं रूपा के ताऊ जी ने, उनके ससुरजी को जुबान दे दी थी कि रूपा और उनकी बड़ी बहन रुक्मा का ब्याह, उनके दोनों बेटों के साथ ही होगा। लेकिन इसमें अच्छी बात यह रही कि रूपा का गौना नहीं हुआ और अपने मायके में ही रही। यहीं से रूपा की जिंदगी में बदलाव शुरू हुआ।

भाई के विरोध के बाद भी बेटी की पढ़ाई जारी रखी

रूपा(Dr Rupa Yadav)बचपन से ही मेधावी छात्रा थीं। गणित में तो इतनी अच्छी कि शिक्षक उसे ऊंची कक्षा में ले जाकर मिसालें देते थे। रूपा के पिता, मालीराम यादव को भी अच्छी तरह पता था कि उनकी बिटिया बाकी सबसे अलग है। वह रूपा को खूब पढ़ाना चाहते थे, पर अपने बड़े भाई के सम्मान के आगे मजबूर थे। फिर भी, उन्होंने हिम्मत नहीं हारी थी। 

खेत में ले जाकर करवाते थे पढ़ाई

वह रूपा को रोज अपने साथ खेतों में ले जाते और वहां उसे शांति से पढ़ने को कहते। रूपा ने भी अपने पिताजी की अपेक्षा पर खरे उतरने में कोई कमी नहीं छोड़ी और आखिर दसवीं में 86% अंक ले आई। पूरा गांव हैरान रह गया था। छोटा सा तो गांव था हमारा, इतने नंबर आज तक कोई नहीं लाया था। रूपा का कहना था कि रिजल्ट आने के बाद सभी ने आगे भी पढ़ाई जारी रखने के लिए कहा। 

जीजा ने किया वादा - पढ़ाई में कभी नहीं आएगी बाधा

लेकिन यहां एक परेशानी बाधा बनकर सामने आ गई। यह परेशानी थी ससुराल में विदाई की। रूपा के पिता इतनी जल्दी गौने के सख्त खिलाफ़ थे। वह चाहते थे कि रूपा यहीं रहकर पढ़ ले, फिर जाए। पर रूपा के ससुरालवाले इससे ज्यादा रुकने को तैयार नहीं थे।


गुस्से में रूपा के पिता ने उसके ससुरालवालों से सवाल किया कि क्या रूपा की काबिलियत के हिसाब से वे लोग उसे पढ़ा पाएंगे? ऐसे में, रूपा के जीजाजी ने उन्हें वचन दिया कि जैसे भी हो, वह रूपा को जरूर पढ़ाएंगे। लेकिन वादा कर उसे निभाना कितना मुश्किल है, यह सभी जानते हैं। लेकिन रूपा के जीजा ने अपना वादा निभाया और समाज के ताने सुनने के बाद भी उसकी पढ़ाई जारी रखी। जिसके लिए उन्होंने कर्ज भी लिया।

रूपा(Dr Rupa Yadav)के बारहवीं में अच्छे नंबरों से पास होने के बाद, उनके स्कूलवालों ने ही उन्हें NEET की कोचिंग दिलाने के लिए एक कोचिंग संस्था की परीक्षा में बिठा दिया। वहां रूपा के इतने अच्छे नंबर आए कि कोचिंग संस्था ने उन्हें बिना किसी फीस के कोचिंग देने का फैसला किया। साथ में, रूपा ने बीएससी में भी एडमिशन ले लिया।

पहले ही प्रयास में रूपा की ऑल इंडिया रैंक 22000 आई। सभी को लगा कि घर के काम करके, परिवार संभाल के और साथ में पढ़ाई करके भी अगर रूपा इतना कर सकती है, तो अच्छी कोचिंग से उसे जरूर मेडिकल में दाखिला मिल जाएगा।

कर्ज लेकर करवायी कोचिंग
 
 इसके बाद मेरे घरवालों के सहयोग से रूपा कोटा कोचिंग के लिए चली गई। जिसके लिए लोगों ने उन्हें खूब ताने दिए कि वे सही नहीं कर रहे हैं, लेकिन सभी मेरे साथ डटकर खड़े रहे। पैसों की किल्लत हुई, तो उधारी ली। मेरे पति और जीजाजी ने एक्स्ट्रा काम भी किया, लेकिन मेरी पढ़ाई जारी रखी।” पहली बार में राजस्थान के मेडिकल कॉलेज में दाखिला नहीं मिला, लेकिन तीसरे साल रूपा का एडमिशन बीकानेर के ‘सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज‘ में हो गया।

ससुराल हमेशा रहा साथ
 
 रूपा बताती हैं कि ससुराल से पूरा साथ मिला“मेरे दीदी-जीजाजी हमेशा मुझे पढ़ने को कहते। मेरे पति हर साल जाते हुए कहते कि चांदी का सिक्का ज़रूर लाइयो (कॉलेज में टॉप 20 छात्रों को सिल्वर मेडल दिया जाता है) और मेरी सास.. वह तो मुझे मंदिर ज़रूर ले जातीं, मन्नत मांगतीं, ताकि मैं डॉक्टर बन जाऊं

दो साल तो बिना किसी बाधा के निकल गए। लेकिन फिर लॉकडाउन लग गया। रूपा घर आ गईं और प्री-फाइनल के पहले ही रूपा को पता चला कि वह माँ बनने वाली है। यहां भी परिवार का साथ मिला और रूपा ने दोनों जिम्मेदारी बखूबी निभाई। डॉ. रूपा(Dr Rupa Yadav)की कहानी इस बात की साक्षी है कि अगर परिवार साथ दे, तो एक माँ भी दोनों चुन सकती है। 

आज आया है फाइनल रिजल्ट

रूपा का फाइनल रिजल्ट 28 अप्रैल 2022 को आ चुका है। बालिका वधु रूपा, आज डॉक्टर रूपा बन चुकी हैं। फिलहाल, वह PG करने की तैयारी में जुट गई हैं और आगे चलकर अपने ही गांव में एक अस्पताल खोलना चाहती हैं। उनके परिवार का कहना है कि चाहे उन्हें अपनी ज़मीन भी बेचनी पड़े, पर वे रूपा का हर सपना पूरा करेंगे।

अक्सर एक माँ को किसी एक को ही चुनना पड़ता है, पर डॉ. रूपा(Dr Rupa Yadav)की कहानी इस बात की साक्षी है कि अगर परिवार साथ दे, तो एक माँ भी दोनों चुन सकती है।


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