मुर्गा की तेरहवीं में 'मुर्गे' का भोज खाने पहुंचे 500 लोग, रिति रिवाजों के साथ हुआ अंतिम क्रिया कर्म

मुर्गा की तेरहवीं में 'मुर्गे' का भोज खाने पहुंचे 500 लोग, रिति रिवाजों के साथ हुआ अंतिम क्रिया कर्म

PRATAPGARH : हिंदू धर्म में किसी शख्स की मृत्यु के बाद तेरहवीं संस्कार होता है. परन्तु आज कल लोग अपने पालतू जानवरों का भी अंतिम संस्कार करते है. अब तक आपने किसी कुत्ते या गाय की मौत होने पर तेरहवीं का कार्यक्रम होते जरुर देखा या सुना होगा, मगर पहली बार किसी मुर्गे की तेरहवीं कार्यक्रम का अजीबो-गरीब मामला सामने आया है. मामला प्रतापगढ़ जिला के फतनपुर थानाक्षेत्र के बेहदौल कला गांव का है. प्रतापगढ़ में मुर्गे की मौत के बाद उसके मालिक डॉ. शालिकराम सरोज ने उसका अंतिम संस्कार कर तेरहवीं के भोज का आयोजन किया. मुर्गे की मौत के बाद विधिवत उसका 13 दिन में तेरहवीं का कार्यक्रम हुआ. 

बेहदौलकला गांव के प्रधान राकेश कुमार सरोज के चाचा डा. सालिकराम ने पांच साल से एक मुर्गा और एक बकरी  पाल रखा था. मुर्गे से पूरा परिवार बेहद प्यार करता था और उसका नाम प्यार से लाली रखा था. मामला 8 जुलाई का है, जब एक कुत्ते ने डॉ. शालिकराम की बकरी के बच्चे पर हमला कर दिया. यह देख उनका मुर्गा लाली कुत्ते से भिड़ गया. लाली ने अपने जान पर खेल कर बकरी के बच्चे को बचा लिया परन्तु लाली कुत्ते के हमले से गंभीर रूप में घायल हो गया और इसके बाद 9 जुलाई की देर शाम लाली ने दम तोड़ दिया. मुर्गे की मौत के बाद घर के पास ही उसका शव दफना दिया गया. 

मुर्गे को राखी बांधती थी डॉक्टर की बेटी


इस मामले को लेकर शालिकराम सरोज की बेटी अनुजा सरोज ने बताया कि लाली मुर्गा मेरे भाइयों जैसा था. उसकी मौत होने के बाद 2 दिनों तक घर मे खाना नहीं बना. मातम जैसा माहौल था. हम उसको रक्षाबंधन पर राखी भी बांधते थे. वहीं डा. सालिकराम उस मुर्गे को बहुत चाहते थे इसलिए उसकी मौत होने पर वह काफी दुखी हो गए थे. बताया जा रहा है कि मुर्गा ज्यादातर वक्त उनके पास ही रहता था. सालिकराम को भी उससे बड़ा लगाव था. ऐसे में उसके मरने पर सालिकराम ने तय किया कि उसका विधिवत अंतिम संस्कार करेंगे. इसके बाद अंतिम संस्कार के कर्मकांड होने लगे।  सिर मुंडाने से लेकर अन्य कर्मकांड पूरे किए गए.

किया गया मुर्गे की तेरहवीं  का आयोजन, 500 लोगों ने किया भोज

 फिर मुर्गे की तेरहवीं पर बकायदा भोज करने की तैयारी शुरू कर दी. बुधवार सुबह से ही हलवाई तेरहवीं का भोजन तैयार करने में जुट गए. उन्होंने अपने गांव के लोगों, रिश्तेदारों व मित्रों को तेरहवीं का निमंत्रण भी भेजा. शाम छह बजे से रात करीब दस बजे तक लोगो ने तेरहवीं का भोज खाया. बताया जा रहा है कि मुर्गे की तेरहवीं संस्कार में करीब करीब 40 हज़ार रुपए खर्च किए गए है.

इस अजब-गजब आयोजन को देखने के लिए करीब पांच सौ से आधिक लोग पहुंचे थे. इस पर तमाम लोगों का कहना है कि यह मानवीय स्वभाव है कि इंसान को लंबे समय तक साथ रहने पर लगाव हो जाता है वह फिर भले ही जानवर हो या कोई पक्षी. लोगों ने इसे पशु-पक्षी प्रेम की मिसाल बताया. पालतु पशु या पक्षी की मौत पर लोग दुखी होते हैं लेकिन सालिकराम ने तो गजब ही कर दिखाया. इसकी चर्चा दूसरे दिन भी इलाके में बनी रही.

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