पैसा फंसा तो सीधे 420 नहीं! पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला-हर जमीन सौदा विवाद नहीं बन सकता आपराधिक केस!

Patna High Court: जमीन के सौदे में बकाया रकम का भुगतान नहीं करना अपने आप में धोखाधड़ी यानी चीटिंग का अपराध नहीं बन जाता। ...

पैसा फंसा तो सीधे 420 नहीं! - फोटो : social Media

Patna High Court: जमीन के सौदे में बकाया रकम का भुगतान नहीं करना अपने आप में धोखाधड़ी यानी चीटिंग का अपराध नहीं बन जाता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी है कि समझौते के वक्त से ही आरोपी की नीयत सामने वाले को धोखा देने की थी। पटना हाईकोर्ट ने सीवान के एक जमीन विवाद में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि हर अनुबंध का उल्लंघन आपराधिक मामला नहीं बन सकता। कोर्ट ने योगेश कुमार सिंह की क्वैशिंग याचिका खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति अलोक कुमार पांडेय ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यदि किसी सौदे के दौरान बाद में भुगतान को लेकर विवाद पैदा होता है तो उसे सिर्फ इसी आधार पर धोखाधड़ी का मामला नहीं माना जा सकता। आपराधिक मुकदमा चलाने के लिए शुरुआत से ही बेईमानी या धोखा देने की मंशा का ठोस आधार रिकॉर्ड पर होना जरूरी है।

मामला 15 जनवरी 2021 को हुए जमीन खरीद समझौते से जुड़ा था। शिकायतकर्ता के अनुसार पांच कट्ठा जमीन की कीमत 2.26 करोड़ रुपये तय हुई थी और सौदे के वक्त 20 लाख रुपये अग्रिम दिए गए थे। बाद में छह कट्ठा छह धुर जमीन की रजिस्ट्री लालिता देवी के नाम कर दी गई। इसके बदले 1.60 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि 46 लाख रुपये और अतिरिक्त जमीन की कीमत के 44.20 लाख रुपये मिलाकर कुल 90.20 लाख रुपये बकाया रह गए। रकम नहीं मिलने पर योगेश कुमार सिंह ने लालिता देवी और शिवजी प्रसाद के खिलाफ धोखाधड़ी, विश्वासघात और आपराधिक षड्यंत्र का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई।

हालांकि सीवान के न्यायिक दंडाधिकारी ने 24 जनवरी 2024 को शिकायत खारिज कर दी। इसके बाद पुनरीक्षण अदालत का दरवाजा खटखटाया गया, लेकिन वहां भी मामले को मूल रूप से दीवानी विवाद मानते हुए राहत नहीं मिली। इसके बाद मामला पटना हाईकोर्ट पहुंचा।

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करते हुए कहा कि सौदे में 1.80 करोड़ रुपये का भुगतान किया जा चुका था। अदालत को ऐसा कोई ठोस तथ्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि समझौते के समय ही आरोपितों की मंशा धोखा देने की थी। कोर्ट ने साफ किया कि केवल बाद में वादा पूरा न करने या बकाया रकम का भुगतान नहीं करने से भारतीय दंड संहिता की धारा 420 के तहत चीटिंग का अपराध स्वतः नहीं बन जाता।

अदालत ने यह भी गौर किया कि शिकायतकर्ता यह स्पष्ट नहीं कर सका कि आरोपितों को ऐसी कोई संपत्ति सौंपी गई थी, जिसका उन्होंने बेईमानी से दुरुपयोग किया हो। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए दोहराया कि हर अनुबंध का उल्लंघन आपराधिक धोखाधड़ी नहीं होता।कोर्ट के मुताबिक इस विवाद का मूल स्वरूप बकाया रकम की वसूली से जुड़ा है, इसलिए इसे आपराधिक कार्यवाही का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने क्वैशिंग याचिका खारिज कर दी।

इस फैसले का सीधा संदेश है कि व्यावसायिक या जमीन के सौदे में भुगतान को लेकर पैदा हुआ हर विवाद पुलिस और आपराधिक अदालत तक नहीं पहुंच सकता। चीटिंग का मुकदमा तभी टिकेगा, जब शुरुआत से ही धोखाधड़ी की नीयत और उसके समर्थन में ठोस तथ्य मौजूद हों।