‘नीतीश सरकार से नहीं मिला सहयोग’, 6 साल इंतजार के बाद बंद हो गया टाटा का संस्थान

‘नीतीश सरकार से नहीं मिला सहयोग’, 6 साल इंतजार के बाद बंद हो गया टाटा का संस्थान

पटना. बिहार में प्रतिष्ठित शिक्षण केंद्रों की स्थापना और विकास की बात जोह रहे नागरिकों के लिए बुरी खबर है. टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस-मुम्बई (टीआईएसएस) ने अपने पटना केंद्र को बंद करने की घोषणा की है. टीआईएसएस छह साल पूर्व वर्ष 2016 में अपने पटना केंद्र को शुरू करने की घोषणा की थी. इसे बिहार जैसे राज्य के लिए बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा गया था लेकिन मात्र छह साल में टीआईएसएस पटना का सपना चकनाचूर हो गया. 

टीआईएसएस पटना के बंद होने की घोषणा के बाद मीडिया रिपोर्टों में दावा किया गया है कि राज्य सरकार की ओर से उचित सहयोग नहीं मिलने के कारण संस्थान को बंद किया गया है. केंद्र के चेयरपर्सन पुष्पेंद्र ने एक मीडिया समूह से बात करते हुए कहा कि शुरुआत में राज्य सरकार ने टीआईएसएस पटना को सहयोग करने की सैद्धांतिक सहमति दी है जिसमें आर्थिक के साथ ही आवासीय सुविधा उपलब्ध कराना भी शामिल था. लेकिन जमीनी स्तर पर कुछ नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि हालांकि हम तक्षशिला सोसाइटी और पटना के लोगों धन्यवाद करते हैं जिनका शारीरिक और नैतिक सहयोग संस्थान को इतने दिनों तक मिला. 

वर्ष 2016 में टीआईएसएस पटना की शुरुआत हुई तब इसका नाम सेंटर फॉर डेवलेपमेंट प्रेक्टिस एंड रिसर्च दिया गया. अपने छह साल के छोटे से कालखंड में टीआईएसएस पटना ने राज्य की सामाजिक एवं आर्थिक समस्याओं और विशेषकर श्रमिकों के पलायन पर प्रभावशाली अध्य्यन पेश किया. बिहार की राजनीति में भूचाल मचाने वाले मुजफ्फरपुर शेल्टर होम नाबालिग यौन उत्पीड़न कांड का खुलासा भी वर्ष 2018 में टीआईएसएस की ऑडिट रिपोर्ट के बाद ही हुआ. अगस्त 2017 में बिहार सरकार ने टीआईएसएस पटना को राज्य सरकार से वित्त पोषित सभी सरकारी शेल्टर होम का ऑडिट करने कहा था. 

टीआईएसएस पटना को तक्षशिला एजुकेशनल सोसाइटी के आर्थिक एवं ढांचागत सहयोग से शुरू किया था. बाद में यूजीसी के मानकों के अनुरूप एक दर्जन से अधिक संकाय एवं शोध कर्मियों की नियुक्ति की गई. केंद्र की ओर से पांच किताबें, 18 जर्नल आर्टिकल, 23 पुस्तकीय चेप्टर आदि प्रकाशित हुआ. वहीं ग्राम पंचायतों की कार्यप्रणाली पर 20 से ज्यादा हिंदी और अंग्रेजी में बुकलेट का प्रकाशन किया गया. 

हालांकि केंद्र की ये सारी गतिविधियां अब इतिहास बन चूकी हैं. सबसे हैरानी की बात है कि संस्थान की ओर से राज्य सरकार से उचित सहयोग नहीं मिलने की बात कही गई है. 


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