पटना उच्च न्यायालय ने महेंद्र दास को दिया झटका, हनुमानगढ़ी ने बनाया था महावीर मंदिर का महंत, पढ़िए पूरी खबर

पटना उच्च न्यायालय ने महेंद्र दास को दिया झटका, हनुमानगढ़ी ने बनाया था महावीर मंदिर का महंत, पढ़िए पूरी खबर

PATNA : हनुमान गढ़ी के गद्दीनशीं महन्त प्रेम दास ने अपने जिस चहेते महेन्द्र दास को महावीर मन्दिर का महन्त बनाया है, उस महेन्द्र दास को अतीत में बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड ने महावीर मन्दिर की एक शाखा (बेली रोड पर स्थित शेखपुरा) मन्दिर का न्यासधारी बनाया था। उस आदेश पर आज पटना उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनिल कुमार सिन्हा ने स्थगन आदेश जारी कर नोटिस जारी किया है। इसका निहितार्थ यह हुआ कि महेन्द्र दास अब महावीर मन्दिर के शाखा मठ के भी न्यासधारी नहीं हुए। महावीर मन्दिर न्यास की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता पी0के0 शाही तथा धार्मिक न्यास बोर्ड की ओर से गणपति त्रिवेदी ने बहस की और तथ्यों को न्यायालय के समक्ष रखा। महावीर मन्दिर की ओर से एडवोकेट ऑन रेकर्ड आर0के0 सिन्हा थे।

महेन्द्र दास अतीत में भी 2009 में शेखपुरा मठ के न्यासधारी घोषित हुए थे। लेकिन उस समय भी पटना उच्च न्यायालय के तत्कालीन न्यायमूर्ति नवीन सिन्हा ने उसको रद्द कर दिया था और इस तथ्य को छुपा कर उन्होंने पुनः अपने को न्यासधारी घोषित कराया था, जिस पर उच्च न्यायालय ने रोक लगा दी है। यह विडम्बना है कि महेन्द्र दास स्वयं को जिस गोपाल दास का चेला घोषित कर शेखपुरा मठ पर दावा करते हैं, उसी गोपाल दास के विरुद्ध उन्होंने पटना के जिला न्यायाधीश के न्यायालय में एक मुकदमा वाद संख्या- 233/2009 दायर किया। जिसमें उन्होंने अपने गुरु को घोर अपराधी, विधवा एवं नाबालिग बालक का हत्यारा बताया है और छापामारी में गुरु गोपाल दास के साथ बदनाम अपराधियों की गिरफ्तारी की बात कही है।

उधर, महेन्द्र दास के गुरु गोपाल दास ने जिला जज के यहाँ शपथ पत्र पर लिखित बयान में कहा है कि महेन्द्र दास मेरा चेला नहीं है, वह साधु भी नहीं है बल्कि गृहस्थ है। उसका नाम महेन्द्र बहादुर सिंह है और वह घर में अपनी माता और भाई के साथ रहता है। गोपाल दास ने अपने शपथ-पत्र में आगे कहा है कि महेन्द्र दास पहले उनका नौकर था और उनकी गाय को खिलाने का काम करता था और इसके लिए उसको दरमाहा मिलता था। जिला न्यायाधीश के समक्ष गोपाल दास जी का यह शपथ-पत्रीय बयान दि- 22-1-2010 का है। उनका देहान्त दि. 09-12-2011 को हुआ था। उनके जीवन का यह अन्तिम शपथ-पत्रीय बयान है, अतः सबसे प्रामाणिक है। इसके सामने अतीत के किसी बयान का महत्त्व नहीं है।

हनुमानगढ़ी के गद्दीनशीं प्रेम दास ऐसे ही ‘नमूना चेला’ को महावीर मन्दिर का महन्त बनाकर मन्दिर का सर्वनाश करना चाहते हैं। महावीर मन्दिर या इसके अधीनस्थ किसी मन्दिर/मठ में महन्त का कोई पद ही कभी नहीं रहा है। यह 1948 ई. और 1990 ई. के पटना उच्च न्यायालय के निर्णय तथा 1994 एवं 1995 ई. के उच्चतम न्यायालय के आदेश से स्पष्ट है।

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