सुप्रीम कोर्ट का फैसला- पत्नी कोई निजी संपत्ति नहीं जिसे पति अपने साथ जबरन रखे

सुप्रीम कोर्ट का फैसला- पत्नी कोई निजी संपत्ति नहीं जिसे पति अपने साथ जबरन रखे

NEW DELHI: सुप्रीम कोर्ट में आए दिन अपने आप में अलग तरह के केस आते हैं. उन मामलों पर दिए गए फैसलों से सुप्रीम कोर्ट हमेशा ही नजीर पेश करता है. किसी एक केस में दिए गए फैसले अन्य मामलों पर भी फैसला सुनाने में सहायक की भूमिका अदा करते हैं. कुछ इसी तरह का फैसला एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट से आया. इस फैसले ने दांपत्य जीवन और आपसी संबंध को लेकर बड़ी बात कही.

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि पत्नी अपने पति की गुलाम या विरासत नहीं होती है जिसे पति के साथ जबरन रहने को कहा जाए. कोर्ट ने यह बयान एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान दिया जिसमें पति ने कोर्ट से गुहार लगाई थी. पति ने कोर्ट से अपनी पत्नी के साथ रहने का आदेश देने की मांग की थी. महिला का दावा था कि साल 2013 में शादी के बाद से ही उसे दहेज के लिए पति ने प्रताड़ित किया. साल 2015 में महिला ने गोरखपुर कोर्ट में याचिका दायर कर पति से गुजारा-भत्ता की मांग की थी. कोर्ट ने पति को 20 हजार रुपये हर महीने पत्नी को देने का आदेश दिया था. इसके बाद पति ने कोर्ट में दांपतिक अधिकारों की बहाली के लिए अपनी याचिका दायर की थी.

गोरखपुर के फैमिली कोर्ट के आदेश के बाद पति ने हाईकोर्ट का रुख किया और याचिका दायर कर गुजारा-भत्ता दिए जाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि जब वह अपनी पत्नी के साथ रहने को तैयार है तो इसकी जरूरत क्यों है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह याचिका खारिज कर दी जिसके बाद शख्स ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. अपने बचाव में महिला ने यह दलील दी कि उसके पति का पूरा खेल गुजारा-भत्ता देने से बचने के लिए है. महिला के वकील ने कोर्ट को यह भी कहा कि पति तभी फैमिली कोर्ट भी गया जब उसे पत्नी को गुजारा भत्ता देने का आदेश मिला.

पूरे मामले के घटनाक्रम को जानने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी दी और पति की उस याचिका को भी खारिज कर दिया जिसमें उसने अपने दांपतिक अधिकारों को बहाल करने की मांग की थी. इस तरह से अब उसे अपनी पत्नी को गुजारा भत्ता देना ही होगा और वो अपनी पत्नी को जबरन साथ रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकता. 

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